National  News 

हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए 

प्रति,

आ प्रधान मंत्री श्री  नरेंद्र मोदी जी 

न्यू दिल्ली ,भारत 

 

प्रति 

आ. श्री भूपेंद्र भाई पटेल साहब 

मुख्य मंत्री श्री 

गुजरात 

 

 

आज महात्मा गांधी साहित्य मंच गांधीनगर जो गांधी नगर साहित्य सेवा संस्थान चेरी टेबल ट्रस्ट गांधीनगर द्वारा हिंदी के प्रचार प्रसार हेतु गुजरात प्रदेश से अध्यक्ष डॉ गुलाब चंद पटेल कवि लेखक अनुवादक द्वारा ऑन लाइन हिंदी कवि सम्मेलन और सम्मान कार्यक्रम सोलह महीनों से आयोजित किए जा रहे हैं 

हिंदी आज भारत की राजभाषा है इसमें महामना का योगदान अतुलनीय है। हमारी मांग है कि हिन्दी प्रेमियों महामना के अधूरे सपने को पूरा करें। हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए सख्त कानून व्यवस्था लागू की जाय और हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाए,हिंदी विश्व में सब से अधिक बोलने वाले लोगों की भाषा है, देश में भी 80 प्रतिशत कार्य, मीडिया और अन्य विज्ञापनों में शामिल हे देश की न्यूज चैनलों ने भी हिंदी भाषा को अपनाया है 

महात्मा गांधी ने आज़ादी के समय हिन्दी में पत्रिकाएं निकाल कर आजादी हेतु अपने विचार लोगों तक पहुंचाया है, हिंदी ने स्वराज प्राप्ति के लिए भी अपना रोल निभाया है 

भारतीय संविधान में हिंदी को राष्ट्रभाषा घोषित किया गया हे किन्तु उसका पालन नहीं हो रहा है 

देश के प्रधान मंत्री नरेंद्र भाई मोदीजी विदेश में भी अपनी बात हिंदी मे प्रस्तुत करते हैं, देश के गृह मंत्री श्री अमित शाह जी ने भी हिंदी के लिए अपने विचार व्यक्त किए हे, हिंदी बोलने वाले लोगों का स्टेट्स अच्छा लगता है, अंग्रेजी बोलने से नहीं. हिंदी को राष्ट्रभाषा बनाने के लिए आप से विनम्र अनुरोध हे कि आप अपनी संस्था के माध्यम से अपनी मांग रखे 

हिन्दी भाषा और साहित्य मे गुजरात का योगदान :

गुजरात का भारत देश मे नाम अग्रसर हे,देश की आज़ादी मे गुजरात के लोगो की अहम भूमिका रही हे ,आज से 100 साल पहले महात्मा गांधीजी जो गुजरात के पोरबंदर के निवासी ने हिन्दी भाषा को आगे बढ़ाने का कम किया हे,यही काम आज देश के प्रधान मंत्री श्री नरेंद्र मोदी जी गुजरात के वड्नगर से हे,वे भी हिन्दी को आगे बढ़ा रहे हे।मोदीजी के रॉम रॉम मे हिन्दी बसी हुई हे और वे गैर  हिन्दी प्रदेशों मे और विदेश मे भी अपनी बात रखते हे ,यु पी एस सी की परीक्षा मे चोर दरवाजे से हिन्दी को भगाने की साजिश रची जा रही थी,लेकिन मोदीजी ने इसे रोक दिया ,डिजिटल दुनिया मे हिन्दी का दबदबा बढ़ा हे,मीडिया मे आज 80 % खपत हिन्दी की हे।

 गुजरात मे हिन्दी साहित्य का विकास ग्यारवी बारहवि सदी से हो रहा हे,समग्र भारत मे गुजरात ही एक प्रदेश हे जहा हिन्दी को राजभाषा के रूप मे स्वीकार किया गया हे,गुजरात के इतिहास मे जब नजर करते हे तो 16 वी सदी मे भक्ति आंदोलन हुआ था मध्यकालीन भक्ति युग को सुवर्णक युग कहलाने मे अनेक संत कवियों ने अनेक आयामो पर अपने विचार व्यक्त किए हे। कहा गया हे की जहा जहा गुजराती गए हे वह वह हिन्दी भाषा भी विकसित हुई हे,गुजराती भाषा के साथ हिन्दी प्रचारित करने मे गुजरातियों का अमूल्य योगदान रहा हे,जैन आचार्य हेमचन्द्र सूरी से लेकर दयाराम तक 12 वी सदी से लेकर 15 वी सदी तक हिन्दी का विकास धीरे धीरे बढ़ रहा था,गुजरात हिन्दी भाषी प्रदेशों से निकट हे,वल्लभी संप्रदाय ,स्वामीनारायण संप्रदाय,सूफी संप्रदाय,जैन संप्रदाय,और संतजनो के व्यापक प्रभुत्व के कारण ,गुजरात के मुसलमानी बादशाहो और राजपूत समाज के हिन्दी प्रेम के कारण गुजरात के आँचल मे हिन्दी को फलने फूलने मे पर्याप्त अवसर प्राप्त हुआ हे,

गुजरात संतो की भूमि हहे,नेमीनाथ,श्रीकृष्णशंकराचार्य वल्लभाचार्य,विठ्ठलनाथ,नानक,और मिराबाई जेसे संतो का गुजरात मे आना जाना रहा ,नानकजी नामदेव कबीर और अखा सब एक ही ज्ञान गुदड़ी के धागे हे,गुजरात के संतो  की फेहरिस्त मे अखो ,प्राणनाथ,भाणदास,रवि,सेम,मोरार,विक्रम,दासजीवन,प्रीतम, धिरो,निरात,भोजो,मनोहर ,चोतम,पैन,दखेरा,अर्जुन नवर आदि सिद्धहस्त हे।निर्गुण काव्य के मूल स्रोत मे जो जैन धारा प्रवाह  मध्य काल के हिन्दी जैन कवियों मे आनदधन ,ज्ञानानन्द ,विनय-विजय,यशोविजय,तथा किसन दास के नाम उल्लेखनीय हे।भक्ति आंदोलन के स्वर्णिम विरासत मे गुजरात के मध्यकालीन हिन्दी जैन कवि आनदधन की वाणी गुजरात के आधुनिक समाज के लिए भी पदप्रदर्शक हे।

  स्वंत्रांत भारत मे गांधीजी द्वारा हिंदुस्तान की व्यवहार मे प्रयुक्ति ,हिन्दी का ,कपड़े मिल उधयोग का गुजरात मे फैलवा,तकनीक उधयोग आदि ने गुजरात मे हिन्दी प्रचार प्रसार मे सरहनीय योगदान दिया,हे,गुजरात विध्यापीठ की स्थापना 1920 गांधीजी द्वारा की गई,राष्ट्र भाषा प्रचार समिति के जेठलाल द्वारा हिन्दी के महत्व पूर्ण कार्य किए गए हे।

कवि दलपतराम,दुलाभाई काग,सुंदरम,राजेंद्र शाह,आदि साहित्यकारो ने हिन्दी मे भी लेखन कार्य किया हे। हिन्दी विश्व को जोडनेवाली भाषा हे,हिन्दी भाषा साहित्य के विकास मे गुजरात ने योगदान दिया होगा एसा सहज विश्वास नहीं होता,किन्तु पता चला हे की,पंदरहवि सदी से लेकर आज तक 350 से अधिक कवि हुए हे।गुजरात अहिंदी भाषी राज्य रहा हे किन्तु आज से पाँचवी छठठी शताब्दी पूर्वा उत्तर भारत के,समस्त तीर्थ स्थलो और सांस्कृतिक केन्द्रो पर यह भाषा बोली समझी जाती थी,गुजरात के कवि अखा उसका प्रमाण हे,पाटन निवासी हेमचंद्र चार्य कृत सिध्धहेम शब्दानुसाशन मे और वढ़वाणके जैनाचार्य मेहतुंग की प्रकल्प चिंतामणि के दोहे और हिन्दी का आदीश्वर निकलता देखा जा सकता हे,श्रीधर कृत रणमल छंद(सवंत 1454 )और पदनाम कृत कान्हाद दे ,प्रबंध (सवंत 1512)मे भाषा का स्वरूप( प्राचीन पश्चिम राजस्थान )और अधिक स्पष्ट हो जाता हे,हम अधिकार के साथ कह सके उस हिन्दी (ब्रज भाषा )के दर्शन हमे सबसे पहले 15 वी सदी के गुजराती कवि भालण की रचनाओ मे होता हे,15 वी सदी से लेकर आज तक हम गुजरात के अंचल से प्राप्त हिन्दी साहित्य को सात विभागो मे विभाजित कर सकते हे,

1 वैष्णव कवियोकी हिन्दी कविताए 

2 स्वामीनारायण संप्रदाय के कवियोकी हिन्दी कविताए 

3 संत कवियों की हिन्दी कविताए 

4 जैन कवियों की हिन्दी कविताए 

5 सूफी कवियो की हिन्दी कविताए

6 अखा और राजश्रित कवियों की हिन्दी कविताए 

7 आधुनिक युग के कवियों की हिन्दी कविताए 

   गुजरात मे वैष्णव भक्ति परंपरा बहुत पहले से प्रचलित हे,उसका श्रेय वल्लभचार्य तथा उनके पुत्र विठ्ठलदास जी को हे।पाटन निवासी केशवलाल कायस्थ (1576 ई )से गुजरात ग्रंथ ,,कृष्णलीला ,काव्य के 14 वे और 16 के सर्ग मे ब्रज भाषा की फुटकर रचनाए मिलती हे,कवि नरसिंह महेता (1500-1580)की भी कुछ स्फुट हिन्दी रचनाए मिलती हे,गुजरात वैष्णव कवियोकी परंपरा मे सुप्रसिद्ध संगीतकर बैजु बावरे का उल्लेख अनिवार्य प्रतीत होता हे,उस प्रख्यात संगीतज्ञ का मूल नाम बैजनाथ था,और वह गुजरात के चांपानेर का निवासी था,गुजरात के बादशाह बहादुरशाह के दरबार मे उसका बड़ा आदर था,गायक होने के साथ साथ वह उच्च कोटी के भक्त और कवि था उसका उदाहरण ,

“पक्षी मणि गरुड़ गय मणी,ऐरावत दिन मणि 

,दिवकर गीत मणि ,संगीत मणि वन मणि ,

वृन्दावन तरुमणि ,कल्पतरु नर मणि 

नारायण तारा मणि ,ध्रुव तीर्थ मणि 

गंगा देव मणि ,शंकर 

नारी मणि उर्वशी ,पुष्प मणि ,कमाल दास 

बैजु मणि मूल मुरलीधर 

    श्री कृष्ण दास अधिकारी गुजरात के चरोतर प्रदेश के पाटीदार थे,और मीराबाई के जीवन के अंतिम 15 वर्ष गुजरात मे व्यतीत हुए थे उन कवियों की हिन्दी रचनाए सुप्रसिद्ध हे,इनके पश्चात इस परंपरा मे द्वारिका के मुकुन्द गुगली ने (1652 ई )हिन्दी मे कबीर चरित्र्य की रचना की हे,जूनागढ़ निवासी कवि त्रिकम दास (1734-1799 ई ) ने डाकोर लीला और रुक्मणी हरण नमक प्रबंध काव्य और 160 के लगभग स्फुट पदो की रचना ब्रजभाषा मे की हे।त्रिकम दास का भाषा पर अच्छा अधिकार था,वैष्णव कवियों की इस सुदीर्घ परंपरा मे चादोद निवासी दयाराम ( 1977-1853 ई )निर्भयम सर्व श्रेष्ठ एवं अप्रतिम हे,इस कवि के ह्रदय मे ब्रज  भाषा के प्रति बड़ा अनुराग था,ब्रज भाषा मे इनहोने 41 ग्रंथ और 12000 स्फुट पदो की रचना की हे,कवि कृष्ण के अनन्य भक्त थे,पुष्टि मार्ग के अनुयाई थे,इनके ब्रज भाषा ग्रंथो मे सतसईया और रसिक रंजन,सर्वोत्कृष्ट हे,

सतसईया मे नीति,भक्ति एवं शृंगार वर्जित हे,रसिक रंजन अपने नाम के अनुरूप रसिको का रंजन करने वाली 280 छंदो की अत्यंत सुंदर एवं रमणीय रचना हे,सत सइया की उदाहरण रूप पंक्तीया ,

“ चाहू बसाये ह्रदय मे धरू त्रिभंगी ध्यान ,

ताते राख्योंकुटिल उर ,होही असीसो ज्ञान 

कब को हरी-हरी रतट हो,कटत न क्यो संताप 

हरत बिरद बिसयो किधों ,दारपे लखी मो पाप 

रसिक नैन नाराच की,अजब अनोखी रीत,

दुश्मन को परसे नहीं,मारे अपनो मित

रूप भूप के राज्य मे यह महान अन्याय

नाम न लेको मूढ़ को ,चातुर मारे जाय “

   दयाराम के परावर्ती वैष्णव कवियों मे शिहोर (भावनगर )निवासी हरख जी महेता( जन्म 1764 ई )और बड़ौदा के निकटवर्ती गाँव के निवासी गिरधर (1787 से 1852 ई )जूनागढ़ के संगीत शास्त्री आदित्य राय (जन्म 1719 ई )और जामनगर के महाराज रीडमलजी की राज कुमारी जागरुता प्रतीय बलम ( जन्म 1835 ई ) के नाम विशेष उल्लेखनीय हे,

   स्वामीनारायण संप्रदाय के कवियों की हिन्दी कविताए 18 वी शताब्दी के पश्चात गुजरात मे वल्लभी संप्रदाय का प्रथम शनै शनै क्षीण होने लगा था ,जैन संप्रदाय मे पहले से ही सामान्य जनता का विश्वास उठ चुका था ,अस्पृश्यता ,अज्ञान और अंध विश्वास की बोलबाला थी,चोरी मांस मदिरा और व्यभिचार आदि व्यसन गुजरात के निम्न वर्ग मे लोगो की दिनचर्या का अंग बन गया था,समाज की ईस स्थिति मे लाभ उठाकर विभिन्न संप्रदाय के संत महंत और बैरागी, समाज पर अपना काबू जमाने के लिए प्रयत्नो मे लगे थे,कवि ब्रह्मानन्द ने तत्कालीन परिस्थितियो का वर्णन अपनी कविता मे किया हे,

“ कोऊक शीश जटा नख दोरख डोलत अंग बंघंबर धारे

केश लूचा अरु कण फटा काऊ घंट बजावत जंगम न्यारे 

कोइक वीर के वादू कहावत ,कौक दादू ही दादू पुकारे 

न्यासी अरु वनवासी कहे अरु और उदासी गुरु मुख गावे 

   इस कल की परिस्थितियो मे सहजानन्द स्वामी ( 1781 -1820 ई) के सत्य प्रयत्नो से गुजरात मे तत्कालीन आवश्यकताओ के अनुरूप स्वामीनारायण संप्रदाय की सभा सामाजिक और धार्मिक कुरीतियो से मोर्चा लिया ,सहजानन्द स्वामी की प्रेरणा से इस संप्रदाय के अंतर्गत संस्कृत,हिन्दी और गुजराती के अनेक सुकवि हुए ,इन कवियों मे से हिन्दी मे कविता करने वाले प्रमुख कवि मुक्तानंद,ब्रह्मानन्द,प्रेमानन्द ,निसकुलानन्द,देवानंद ,भूमानंद और मंजूकोसानन्दआदि थे। ये कवि संगीत के जानकार थे,और इन सभी ने हिन्दी मे नीति वैराग्य और कृष्ण भक्ति विषय मे सरल सुमधुर अवाम बोधप्रद पदो की रचना की हे,वल्लभचार्य जी के अष्ट छाप के आठ कवियों की भांति सहजानन्द के ये अहिंदी भाषी आठ कवि भी भक्ति भावना और काव्य प्रतिभा की द्रष्टि से अपना विशिस्ट महत्व रखते हे 

   इन आठ कवियों मे मुक्तानंद ,ब्रह्मानन्द और प्रेमानन्द की त्रिपुटी बहुत ही प्रखर एवं प्रतिभाशाली हे,इन कवियों मे से मुक्तानंद ( 1761 से 1830 ई 0 सहजानन्द स्वामी गुरु भाई थे ,इनहो ने विवेक,चिंतामणि और सत्संग शिरोमणि नमक दो ग्रंथो की हिन्दी मे रचना की हे ,ये परम निष्ठावान कृष्ण भक्त थे इनकी रचना का एक उदाहरण,

“छाँडीके घनश्याम और को धरू जो ध्यान 

फाड़ डारो छाती मेरी कठिन कुठार सो “

  स्वामी ब्रह्मानन्द (1772 -1832 ई ) इस संप्रदाय के श्रेस्ठ कवि हे,उनका जन्म डूंगर पुर के खाण गाँव मे और शिक्षा दीक्षा भुज की ब्राह्मण पाठ शाला मे हुई थी,बचपन का नाम लाडु बारोट ,जवानी का नाम श्री रंग और उतरावस्था मे ब्रह्मानन्द था,इनहो ने तीनों नमो से कविता की हे,हिन्दी मे इनहो ने संप्रदाय प्रदीप ,सुमति प्रकाश उपदेश चिंतामणि ब्रज विलास और सेंकड़ों संगीतात्मक स्फुट पदो की रचना की हे,भाव और भाषा की द्रष्टि से इनकी रचनाए उत्कृष्ट हे,

इनकी रचना उदाहरण के रूप मे ,

“ कण कुँवर मन भाए ,आलिरि मेरे कान कुँवर मन भाए 

मे जो खड़ी थी अपने भुवन मे ,चल के अचानक आए 

कोमल गात ण जात बखाने छेल छगन रंग छाए 

ब्रह्मानन्द ज़ोर दृग मोसे मंद मंद मुसकाए 

  गढ़ड़ा निवासी प्रेमानन्द स्वामी ( 1769-1845 ई )मुख्यतया संगीतज्ञ थे,इनकी कविता बहुत सरल एवं प्रभाव पूर्ण हे ,गांधीजी की भजनावली मे इनके ब्रज भाषा के तीन पद संग्रहीत हे,इनहोने ब्रज भाषा मे 7000 पदो की रचना की हे,एक उदाहरण 

“बैरन मेरी रे बाजी बासुरी ,श्रयन सुनत मोरी सूज बुज बिसरी 

नैना क़हत हे मेरे आसुरी ,विरहा भरी बाजे बन कासुरी 

,छेदे  करेजा रे मोरी बासुरी

केसे करू अक कल न परे मोरे ,निकसत नाहीं रे मेरी सासुरी 

प्रेमानन्द घनश्याम पिया मोरे ,जिया मे ठारे रे प्रेम फासुरी “

  गुजरात के मतावलंबी ज्ञान मार्गी संतो ने भी हिन्दी मे कविता की हे,कबीर का अपने पुत्र कमाल के साथ गुजरात आना और भृगु कच्छ (भड़ौच) मे ठहरना प्रथम हे,मध्यकालीन संत कवियों मे कबीर का प्रभाव पड़ा हे,संत दादू का जन्म अहमदाबाद मे हुआ ( ई स 1545 ) था,धानी पंथ के सुप्रसिद्ध  संत प्राणनाथ का जन्म भी ई स 1619 मे जामनगर मे हुआ था,इन सेंटो की वाणी से हिन्दी सेवी संसार सुपरिचित हे,कहने का तात्पर्य यह हे की,हिन्दी भाषा और साहित्य के प्रचार प्रसार मे और विकास मे संतो महंतो की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण रही हे,

जूनागढ़ के ब्रह्मज्ञान नगर संत ,काठियावाड के संत भोजो भगत ,बड़ौदा के धिरो ,हिन्दी मे भक्ति कविताए लिखते थे,गुजरात के शताधिक हिन्दी सेवी जैन कवियों मे आनदधन ,ज्ञाननंद ,विनय विजय ,यज्ञों विजय और किसनदास प्रमुख थे,

  सूफी संत पाटन निवासी फकीर हसरत कुतुबअहमद ने अहमदाबाद बसाया था ,हसरत कुतुके आमद की बानी देखिये ,

“ कंधी का राजा तुम ,सर कोई न बूझे 

सकी का राजा तुम सर कोई न बुझे  “

  हसरत सैयद महमद जौनपुरी घूमकड्ड सूफी संत थे,इनहोने गुजरी हिन्दी मे कुछ अलफाज कहे हे,

हु बल हारी सजना हु  बल हार,हु साजन सहरा साजन मुझ गलहार

तू रूप देख जग मोहया ,चंद तारायन भान 

उनही रूप पहन हाऊ का वही न होवि आन 

सूफी संतो ने भी हिन्दी मे अपनी भूमिका निभाई हे,

  इसके अतिरिक्त गुजरात के चारणों ने मुक्तक रचनाए की हे,गुजरात मे गद्य लेखन भी बहुत हुआ हे,दयानन्द सरस्वती से लेकर गांधीजी तक गद्य लेखन की यह परंपरा प्रचलित रही हे,स्व,मशरुवाला ,काका साहब कालेलकर ने भी हिन्दी मे बहुत कुछ लिखा हे,पंडित सुखलाल जी और श्री इंद्रा वसावडा के नाम गुजरात के प्रारम्भिक हिन्दी गद्य लेखको मे उल्लेखनीय हे,उपर्युक्त विवरण से स्पष्ट होता हे,की गुजरात के विविध सम्प्रदायो और सेंटो के आश्रममे  भी हिन्दी को फलने फूलने का पर्याप्त अवसर मिला हे,15 वी सदी से आज तक गुजरात मे हिन्दी के असंख्य कवि हुए हे,अहिंदी भाषी राज्य गुजरात के अंचल से विपुल साहित्य संपदा हिन्दी मे उपलब्ध हे,उसे देखकर यह कहा जा सकता हे,की हिन्दी साहित्य को गुजरात की यह दें मुक होते हुए भी महान हे,

   गुजरात के समकालीन हिन्दी कविता की प्रमुख प्रवृतीया रेखांकित करना चाहते हे,चाहते हुए भी हम इन कवियों के व्यक्तित्व को एवं कृतित्व को विस्तृत परिचय नहीं दे पाएंगे,और न उनकी गुनवता और भाषा शैलीगत विशिष्टता का विवेचन कर सकेंगे यहा इन कवियों के स्वरूप सारगरवित परिचय मात्र से ही संतोष प्राप्त करना होगा,

१ श्री किशोर काबरा: डॉ नन्द किशोर काबरा अहमदाबाद २: डॉ शेखर चन्द्र जैन भावनगर ३, श्री राज कुमार गुप्त : ४,श्रीमति सुधा श्रीवास्तव : ५, श्री घनश्याम अग्रवाल ६ डॉ अग्रवाल बहाउद्दीन कॉलेज जूनागढ़ ,७, डॉ गुलाब चंद पटेल गांधीनगर : हिन्दी गुजराती कवि लेखक अनुवादक  सामाजिक कार्यकर , महात्मा गांधी साहित्य सेवा संस्थान गांधीनगर के अध्यक्ष हे,आप गुजरात स्तरीय गोवा सम्मेलन के राज्य समन्वयक रहे हे,८,अखिलेश श्रीवास्तव : ९ श्री शेख आदम आबूवाला ९१०श्री विजय तिवारी :, ११ डॉ चन्द्र कान्त महेता : १२ डॉ पार्वती गोसाई : आप सरदार पटेल यूनिवर्सिटी आणंद मे हिन्दी की अध्यापिका हे, आठ संपादित पुस्तके प्रकाशित हे, आप गुजरात स्तरीय साहित्य सम्मेलन गोवा की अध्यक्षा हे ,१३ श्री नरेंद्र भाई जोशी: १४ रघुवीर चौधरी :१५ डॉ अंबालाल  नागर 

डॉ गुलाब चंद पटेल कवि लेखक अनुवादक ,

अध्यक्ष महात्मा गांधी साहित्य सेवा मंच ,गांधीनगर गुजरात 

पता : हरीकृपा प्लॉट-1271 सैक्टर-14 गांधीनगर 382016 

मो 8849794377

ईमेल patelgulabchand19@gmail.com :gulabchandpatel15072@gmail dot,com

संदर्भ : हिन्दी भाषा और साहित्य के विकाश मे गुजरात का योगदान 

प्रकाशन वर्ष-1985 पृष्ठ 425 कीमत 200 रुपए 



Posted By:ADMIN






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