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अंततः जीत सत्य की होती है - ब्रह्माकुमारी मंजू दीदी


दस विकारों पर विजय प्राप्ति का पर्व है विजयादषमी
रावण दस विकारों का व कुंभकरण आलस्य का प्रतीक है...
ऑनलाइन सत्संग में बताया गया दशहरा का आध्यात्मिक रहस्य

बिलासपुर टिकरापारा :- आज बुराइयों रूपी रावण का वास हर घर में हो गया है। वर्तमान समय कई बार यह देखने में आता है कि असत्य और बुराई की जीत हो रही है और सत्य हारता हुआ प्रतीत होता है लेकिन वास्तविकता यह है कि असत्य या बुराई की जीत अल्पकालिक होती है। अंतिम जीत सत्य की ही होती है। परमात्म महावाक्य हैं कि सत्य की नाव हिलेगी-डूलेगी मगर डूब नहीं सकती तथा सत्य के सूर्य को असत्य के काले बादल ढ़ंक नहीं सकते। आज हम विजयादशमी के दिन अपनी किसी न किसी बुराई को छोड़ने का संकल्प अवश्य लें। काम, क्रोध, लोभ, मोह, अहंकार तो पांच मुख्य विकार हैं ही परन्तु साथ ही आलस्य व अलबेलेपन को छठवें व सातवें विकार के रूप में बताया गया है। अपने कार्यों, लक्ष्य, पढ़ाई, जिम्मेदारी आदि के प्रति आलस्य व अलबेलेपन का त्याग करना आवश्यक है। अन्य विकारों में ईर्ष्या-द्वेष, नफरत व वैरभाव- ये सभी मुख्य दस विकार हैं जो रावण के दस शीशों के प्रतीक हैं।
उक्त बातें टिकरापारा में ऑनलाइन सत्संग में ‘विजयादशमी का आध्यात्मिक रहस्य’ विषय पर साधकों को संबोधित करते हुए सेवाकेन्द्र प्रभारी ब्रह्माकुंमारी मंजू दीदी जी ने कही।
रावण को जलाने के साथ राम से प्रीत भी लगाएं...
दीदी ने बताया कि हम हर वर्ष रावण दहन के साथ अपनी कुछ बुराईयों को छोड़ने का संकल्प लेते तो हैं किन्तु वह दोबारा हममें प्रवेश कर जाता है क्योंकि हम रावण तो जला लेते हैं लेकिन अपने मन-बुद्धि की प्रीत परमात्मा के साथ नहीं जोड़ते जिससे हमारी बुद्धि सत्संग को छोड़ कुसंग की ओर चली जाती है और बुराईयां हमारे अंदर प्रवेश कर जाती हैं। रामायण की चौपाइयों में चार राम की विवेचना की गई है - एक राम दशरथ के बेटे, दूसरा सभी मनुष्यों के अंदर स्थित आत्मा को भी राम की संज्ञा दी गई, साथ ही तीसरे राम के रूप में सभी जीव-जन्तुओं की आत्मा को भी राम कहा गया है किन्तु चौथे राम के लिए कहा जाता है कि वे इस जग से न्यारे हैं अर्थात् निराकार ज्योतिस्वरूप परमात्मा की महिमा की गई है जिसके लिए तुलसीदास जी ने बहुत सुंदर व्याख्या की है कि बिनु पग चलै, सुनै बिनु काना, कर बिनु कर्म करै विधि नाना, आनन रहत सकल रस भोगी, बिनु वाणी वक्ता बड़ जोगी...अतः सार यही है कि सत्संग को अपने दैनिक जीवन का हिस्सा बनाना जरूरी है।
सदा खुश रहें तो रावण को दोबारा जलाना नहीं पड़ेगा...
हमारे जीवन में यदि दुख या अशान्ति है तो कहीं न कहीं हमारे अंदर बुराइयों का वास है। हम दूसरों को बदलना तो चाहते हैं लेकिन खुद की ओर हमारा ध्यान नहीं जाता। इसलिए सदा खुश रहने के लिए दूसरों में बदलाव चाहने की अपेक्षा अपनी कमजोरियों को महसूस करते हुए उसे दूर करें। जब हम सदा प्रसन्न रहेंगे तो हमें बार-बार रावण दहन की आवश्यकता नहीं पड़ेगी।
कुंभकरण घोर आलस्य व मेघनाथ क्रोध का प्रतीक...
विजयादशमी के दिन रावण के साथ कुंभकरण व मेघनाथ का भी पुतला जलाते हैं क्योंकि कुंभकरण आलस्य व मेघनाथ क्रोध व रोब का प्रतीक है जो कि विशेषकर युवाओं में देखने को मिलता है। सफलता प्राप्ति के लिए आलस्य को मारना जरूरी है और स्वयं को शीतल बनाकर अपने क्रोध व रोब की गरजना को समाप्त करना होगा...
चैतन्य देवी का दर्शन भी ऑनलाइन
टिकरापारा सेवाकेन्द्र के ज्ञानगंगा हॉल में चैतन्य देवी विराजित हैं। वैश्विक महामारी कोरोना को ध्यान में रखते हुए ऑनलाइन दर्शन को ही प्राथमिकता दी जा रही है।



Posted By:Utpal Sengupta






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