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क्या नेहरू अपने पहले कैबिनेट में सरदार पटेल को नहीं रखना चाहते थे?

नेहरू वर्सेस पटेल. पिछले कुछ सालों से भारतवर्ष में कामयाबी से खड़ी की गई बाइनरी. यूं जैसे दोनों एक दूसरे के जानी दुश्मन रहे हों. नेहरू की जगह पटेल की कल्पना कईयों को बड़ी मनोहारी लगती है. ‘पटेल पहले पीएम होते तो’ से शुरू होने वाले बेशुमार वाक्य आपको रैंडम गूगल सर्च में मिल जाएंगे. कहने की बात ये कि एक बड़ा तबका नेहरू और पटेल को ऐसी तलवारें मानता है, जो एक मयान में समा ही नहीं सकती थीं. इसी आग में पेट्रोल छिड़कने गाहे बगाहे इन दोनों के बीच सब सहज न होने की ख़बरें इतिहास से खोदकर लाई जाती रही हैं. ऐसा ही कुछ अब बरामद हुआ है, जो विद्वानों में मतभेद से लेकर ट्विटर वॉर तक की वजह बन रहा है.

क्या है नया मामला?

एक किताब आई है. वी पी मेनन की बायोग्राफी. उनकी पडपोती नारायणी बासु ने लिखी है. नाम है ‘वी.पी.मेनन: दी अनसंग आर्किटेक्ट ऑफ मॉडर्न इंडिया’. इसी किताब से वो बारूद बरामद हुआ है, जिसने फिर एक बार नेहरू-पटेल को आमने-सामने खड़ा कर दिया है. बहसबाज़ी हो रही है सो अलग.

Narayani Basu V P Menon

नारायणी बासु और उनकी किताब. किताब एस एंड एस इंडिया पब्लिकेशन से छपी है.

वी.पी.मेनन अंग्रेज़ों के ज़माने के प्रशासनिक अधिकारी रहे थे, जिन्होंने कई वाइसरॉय के अंडर काम किया. बंटवारे के वक्त और ख़ास तौर से रियासतों के भारत में विलय के वक्त उनकी भूमिका काफी महत्वपूर्ण रही. मेनन ने सरदार पटेल के साथ काफी अरसा काम किया. और उसी साथ बिताए वक्त में से कुछ किस्से उनकी पडपोती ने किताब में लिख दिए हैं. उसी पर बवाल है.

किताब के मुताबिक,

नेहरू सरदार पटेल को अपनी पहली कैबिनेट में नहीं शामिल करना चाहते थे. कैबिनेट की पहली लिस्ट से भी पटेल को बाहर कर दिया था. वो तो वी.पी.मेनन ने हस्तक्षेप किया तो बात बनी. मेनन माउंटबैटन के पास गए और कहा, “इससे एक जंग शुरू हो जाएगी. कांग्रेस के दो टुकड़े हो जाएंगे”. इसके बाद माउंटबैटन महात्मा गांधी से मिले और पटेल का नाम शामिल कर लिया गया.

किताब वी.पी.मेनन के हवाले से एक और दावा भी करती है. कि नेहरू ने पटेल को जनता की यादों से मिटा डालने की नपी-तुली साज़िश भी की थी. कैसी ये स्पष्ट नहीं किया गया है.

# मंत्री वर्सेस इतिहासकार

भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने इस किताब का विमोचन किया. और किताब के हवाले से ही ट्विटर पर मामला लिख डाला. ये भी कहा कि लेखिका अपनी बात पर कायम हैं. जवाब जाने-माने इतिहासकार रामचंद्र गुहा की तरफ से आया. उन्होंने इस बात को कपोल-कल्पना बताया. ‘दी प्रिंट’ में छपे प्रफ़ेसर श्रीनाथ राघवन के एक आर्टिकल का हवाला देते हुए. मंत्री जी को सलाह भी दी कि भारत-निर्माताओं में दुश्मनी की झूठी ख़बरें फैलाना विदेश मंत्री का काम नहीं है. ये काम वो बीजेपी आईटी सेल के लिए छोड़ दें.

जयशंकर का वो ट्वीट जिससे बवाल शुरू हुआ. (फोटो: ट्विटर स्क्रीनशॉट)

जयशंकर का वो ट्वीट जिससे बवाल शुरू हुआ. (फोटो: ट्विटर स्क्रीनशॉट)

एस जयशंकर ने गुहा के ट्वीट पर एक और प्रतिक्रया लिख मारी. कहा,

“कुछ विदेश मंत्री किताबें भी पढ़ते हैं. प्रफेसर्स के लिए भी ये अच्छी आदत साबित हो सकती है. अगर पढ़ना चाहें, तो मैं कल विमोचित किताब को रेकमेंड करना चाहूंगा”.

Guha

रामचंद्र गुहा का प्रतिउत्तर.

बहरहाल, बड़े लोग ट्विटर पर मतभेद सुलझा रहे हैं. अपन ये देखते हैं कि इसका काउंटर में क्या उपलब्ध है!

# कौन सच्चा, कौन झूठा!

हिस्टोरियन रामचंद्र गुहा ने जिन प्रफेसर राघवन के आर्टिकल का ज़िक्र किया, उसके की पॉइंट्स भी यहां देख लिए जाएं तो कोई हर्ज नहीं. उनके आर्टिकल की प्रमुख बातें कुछ यूं हैं.

# इस तरह का ये पहला क्लेम नहीं है. पहली बार ये बात 1969 में लिखी गई एक किताब में कही गई थी. एच.वी.हडसन की किताब ‘दी ग्रेट डिवाइड: ब्रिटेन, इंडिया, पाकिस्तान’ में. इसमें वी. पी. मेनन के एक इंटरव्यू का ज़िक्र है. उसी इंटरव्यू में मेनन ने ये बात कही थी (ऐसा किताब में लिखा है).

# बासू की किताब के मुताबिक़ अगस्त 1947 के पहले हफ्ते में नेहरू ने एक लिस्ट सबमिट की थी. उन नामों की, जिनको लेकर वो कैबिनेट बनाना चाहते थे. इस लिस्ट में पहला नाम पटेल का होना चाहिए था, जो नहीं था. प्रफेसर राघवन लिखते हैं कि वो लैटर उपलब्ध है और उसमें पहला नाम पटेल का ही है.

# अपनी इसी बात को राघवन 1 अगस्त 1947 के माउंटबैटन के एक बयान से भी बल देते हैं. माउंटबैटन ने कहा था कि पटेल दिन-रात नई कैबिनेट बेहतर बनाने के लिए मेहनत कर रहे हैं.

# राघवन नेहरू द्वारा जॉन मथाई को लिखे एक और पत्र का भी ज़िक्र करते हैं, जिसमें उन्होंने लिखा था, “सारे मौजूदा कैबिनेट मिनिस्टर्स वैसे ही रहेंगे, सिर्फ राजाजी को छोड़कर, जो गवर्नर बनेंगे”.

उधर कांग्रेसी नेता जयराम रमेश ने भी ट्विटर पर एक लैटर पोस्ट किया है. उनके मुताबिक़ ये लैटर पंडित नेहरू का लिखा है और इसमें सरदार पटेल का नाम है.

वो लैटर आप इस ट्वीट पर जाकर देख सकते हैं.

Jairam Ramesh@Jairam_Ramesh

In light of the fake news doing the rounds that Pandit Jawaharlal Nehru did not want Sardar Vallabhbhai Patel in his cabinet, sharing a series of letters & documents.

Here's the truth:
1. Nehru letter to Mountbatten of July 19th 1947 with Patel right on top of new cabinet list

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1:56 PM - Feb 13, 2020

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# नारायणी बासु का पिछला क्लेम

नारायणी बासु ने इससे पहले भी नेहरू-पटेल रिश्तों पर कुछ लिखा था. नवंबर 2018 में उनका एक आर्टिकल पब्लिश हुआ था. जिसमें लिखा था कि मेनन के मुताबिक़ नेहरू-पटेल में से पटेल ज़्यादा काबिल शासक थे. मेनन के मुताबिक़ नई-नई आज़ादी मिले मुल्क को पटेल जैसा मज़बूत आदमी ही हैंडल कर सकता था. अपने उसी आर्टिकल में नारायणी ने ये भी लिखा था कि पटेल की 1950 में हुई मौत के बाद वी. पी. मेनन का कद काफी घटा दिया गया था.

Vp Menon

नेहरू के साथ वी पी मेनन (फोटो: इंडिया टुडे अकाइव)

बहरहाल, दावों-प्रतिदावों के बीच इतिहास एक बार फिर फंस गया है. खैर ये कोई बड़ी बात नहीं. हमारे प्रधानमंत्री तक इस बहस में पार्टी बन चुके हैं. फरवरी 2018 में पीएम नरेंद्र मोदी ने लोकसभा में कहा था,

“अगर सरदार वल्लभभाई पटेल देश के पहले प्रधानमंत्री होते, तो कश्मीर का एक हिस्सा कभी भी पाकिस्तान के कंट्रोल में नहीं होता”.



Posted By:ADMIN






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