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ये मन उड़ते परिंदों की तरह होता है-मुनि श्री

मन उड़ते परिंदे के समान है,आने वाली पीढ़ी को धार्मिक संस्कार देना जरूरी, हमेशा जीवन में विनम्रता का व्यवहार करें - मुनि वैराग्य यश विजय महाराज 

सुशील संचेती

आष्टा ।आज के समय में 4 प्रकार की वस्तुएं बड़ी दुर्लभ होती है ,मनुष्य जीवन प्राप्त होना ,धर्म ,श्रद्धा एवं धर्म आचरण। मन उड़ते हुए परिंदे के समान है। आज के समय में हम अपने बेटा-बेटी को स्कूल तो अवश्य भेजते हैं समय पर ,लेकिन धार्मिक संस्कार हेतु पाठशाला नहीं भेजते हैं ।बच्चे पब्जी खेलने में मस्त रहते हैं ।हमेशा जीवन में विनम्रता का व्यवहार करें ।जीवन में समता धारण कर जीवन को सार्थक करें। भगवान आदिनाथ, पार्श्वनाथ एवं महावीर स्वामी सहित अनेक भगवन्तों के शासनकाल की देशना को सुना है, लेकिन अपने मन में अर्थात जीवन में कोई परिवर्तन नहीं लाए ।प्रतिक्रमण ,भक्ति से धर्म नहीं ,धर्म आत्मा से होता है।

                        उक्त बातें श्री महावीर श्वेतांबर जैन मंदिर गंज के उपाश्रय में मुनि वैराग्य यश विजय महाराज ने आशीष वचन के दौरान कही। आपने कहा कि अच्छे व्यक्ति के लिए अर्थात जागने वाले के लिए एक शब्द ही काफी है, जो भी सुना उसे मौह की नींद में उड़ा दिया ।अनेक परमात्मा ओं की देशनाओं को सुनने व समोशरण में बैठने का मौका मिला, फिर भी आत्मा जागृत नहीं हुई है ।जिस प्रकार घर, वस्तु ,सामान की चिंता करते हैं ,लेकिन अपने मन की नहीं ।कषायों की मन में गंदी नाली बह रही है । बाह्य क्रियाओं को कर रहे हैं लेकिन आंतरिक क्रियाओं पर कोई ध्यान नहीं दिया जा रहा है। ना ही समझने का प्रयास कर रहे हैं ।मुनिश्री ने कहा कि मन की गहराई में जाने व चिंतन करने का प्रयास करें ।पापों का प्रायश्चित भी हो सकता है। मैली चादर ओढ़ कर प्रभु के द्वार कैसे जाऊं। मनुष्य जागने का प्रयास नहीं कर रहा है ।जो सोता है वह खोता है ,जो जागता है वह पाता है। मुनि वैराग्य यश विजय महाराज ने आगे कहा कि मन चैतन्य, चंचल है। पांचों इंद्रियों को दमन करना होगा, तभी मन पर नियंत्रण होगा। मात्र पूजा-अर्चना व भक्ति से मानव का कल्याण नहीं होगा। सांसारिक कर्मों के लिए प्रभु से आराधना न करें ,प्रभु जैसा बनने की चाहत अवश्य उनके समक्ष प्रकट करें ।सांसारिक कार्यों के लिए आज व्यक्ति के पास समय है ,लेकिन धर्म के लिए नहीं। मुनिश्री ने कहा कि बच्चों को मोबाइल दे देते हैं वह व्हाट्सएप, टि्वटर, गेम , पब्जीआदि में रमा रहता है ।वह बच्चा बड़ा होकर आपकी देखरेख करना तो दूर आपको पूछेगा भी नहीं और न ही वह धर्म को जिंदा रख पाएगा ।कुंभकर्णीय निंद्रा में सोए हैं ।बच्चों पर ध्यान नहीं दे रहे हो। एक शब्द ने महाराष्ट्र के एकनाथ नामक व्यक्ति की जिंदगी को बदल दिया था ।उन्होंने बताया कि वह एकनाथ नामक व्यक्ति एक मंदिर में पुजारी का कार्य करता था और वहां पर एक महंत भी थे। एक बार हिसाब के दौरान एक रुपए का हिसाब नहीं मिल रहा था, जिसके कारण एकनाथ पुजारी काफी परेशान रहे, उनका न पूजन में मन लग रहा था और न ही भगवान की भक्ति करने में मन लग रहा था ।देर रात तक वह हिसाब मिला रहे थे, जैसे ही रात को 1 बजे एक रुपए का हिसाब मिला ,तो वह खुशी के मारे बोले मिल गया, मिल गया, यह शब्द सुनकर वहां पर उनके साथ रहने वाले महंत ने पूछा क्या मिल गया तो बताया कि 1रुपए  का हिसाब नहीं मिल रहा था ,वह मिल गया। महंत ने कहा तुमने आज पूरा दिन और रात 1 बजे तक एक रुपए के चक्कर में निकाल दी और इस पर ध्यान नहीं दिया कि यह जिंदगी कैसे निकल रही है। बस यह शब्द सुनते ही एकनाथ पुजारी को वैराग्य उमड़ आया और उन्होंने सब कुछ छोड़कर त्याग ,तपस्या के मार्ग पर अग्रसर हुए। आज भी एकनाथ के त्याग ,ईमानदारी को महाराष्ट्र के लोग उदाहरण के रूप में प्रस्तुत करते हैं ।मुनि श्री ने कहा कि जिस प्रकार एक शब्द मात्र से एकनाथ की जिंदगी बदल गई। उसी प्रकार हमें भगवान महावीर की देशना से अपने जीवन में परिवर्तन लाना चाहिए। एकनाथ ने अपनी स्वयं की गलती मानी थी और आज के समय में लोग अपनी गलती भी दूसरे के सिर पर डालने में देरी नहीं करते हैं। जीवन को सफल बनाने के लिए वैराग्य और साधना का मार्ग चुनना होगा। जैन धर्म का ध्वज लहराते रहे। प्रतिक्रमण ,भक्ति में धर्म नहीं धर्म आत्मा से होता है ।सिर पर तिलक लगाने से जैन, नहीं भाव से भी जैन बने। साधु भगवंत की बातों को जीवन में उतार कर धर्म लाभ लेवे ।मुनि श्री ने कहा एक शब्द औषधि का काम करता है ,तो दूसरा शब्द घाव भी उत्पन्न कर देता है। दो शब्द पूरे आनंद को कड़वा कर देता है । मीठे- मीठे शब्द कितने मधुर लगते हैं ।किसी भी चीज को अनेकांतवाद की दृष्टि से देखा जाता है अकबर बीरबल का एक किस्सा भी आपने सुनाया। जरा सा गलत बोलने पर कितने कर्म बनते हैं ,इस पर ध्यान नहीं दिया ।हमेशा जीवन में समता धारण करें ।जीवन प्रगतिशील बनेगा। 2 इंच की जुबान ज्यादातर सास- बहू में चलती है ।एक शब्द अमृत देता है तो दूसरा शब्द जहर भी देता है ।जीवन में परिवर्तन झकझोर भी देगा। तीन बातों पर आप ने प्रकाश डाला 

                           पानी के पास सब कुछ है लेकिन एक चीज नहीं है ,वह है छुआछूत। पानी अमृत है यह सभी की प्यास बुझाता है ।चाहे वह मनुष्य हो या कोई भी जीव हो और पानी सुलभ है ।भगवान महावीर ने सभी जीवो को समान व दया भाव का संदेश दिया था। आज हम अपने ही घर में छुआछूत करते हैं ,लेकिन पानी छुआछूत नहीं करता है। चोला कैसा भी हो संत का ,लेकिन महावीर की बातें ही कहेंगे ।धरती के पास सब कुछ है लेकिन एक चीज नहीं है वह है घमंड और अहंकार। अगर धरती घमंड और अहंकार करे तो विनाश होने में देरी नहीं लगेगी। हम धरती के बल पर रह रहे हैं। आपने कहा कि पद मिलते ही अहंकार आ जाता है, घमंड आ जाता है। पद प्रतिष्ठा के पीछे ना पड़े और ना ही भागे कितनी ही उपलब्धि आ जाए कभी घमंड ना करें ।घमंड ,अहंकार करने वाले का अंत बुरा होता है। इसी प्रकार मनुष्य के पास सब कुछ है लेकिन एक चीज सब्र और संतोष नहीं है। भगवान महावीर ने भी कहा है व्यक्ति जन्म से नहीं कर्म से महान बनता है।



Posted By:Sushil sancheti






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