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वाणी न बनें बाण - समणी डॉ. सुयशनिधि

 
 
जयगच्छाधिपति  व्याख्यान वाचस्पति, वचन सिद्ध साधक, उग्र विहारी, बारहवें पट्टधर आचार्य प्रवर श्री पार्श्वचंद्र जी म.सा. के आज्ञानुवर्ती एस.एस.जैन समणी मार्ग के प्रारंभकर्ता डॉ. श्री पदमचंद्र जी म.सा. की सुशिष्याएं समणी निर्देशिका डॉ. समणी सुयशनिधि जी एवं समणी श्रद्धानिधि जी आदि ठाणा 2 के पावन सान्निध्य में श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन श्रावक संघ के तत्वावधान में गुवाहाटी नगरी के श्री वर्धमान स्थानकवासी जैन भवन में एक विशाल धर्म सभा को सम्बोधित करते हुए समणी डॉ. सुयशनिधि जी ने कहा कि वाणी एक ऐसा दर्पण है जो मनुष्य के ह्रदय की श्रेष्ठता व निकृष्टता का प्रतिबिंब उपस्थित करता है। विवेकी व्यक्ति वाणी के द्वारा दुश्मन को दोस्त और पराये को भी अपना बना लेता है। व्यक्ति भाषा से मधुरता से आसपास के वातावरण को अपने अनुकूल बना लेता है। सम्मान का पात्र बनता है। वहीं दुरुपयोग से अपमान व निंदा को सहन करना पड़ता है। डॉ. समणी ने कहा कि अशांति - कलह का मूल कारण अधिकतर वाणी का दुरुपयोग है। क्रोध में व्यक्ति स्थान बदलने का काम करते हैं। जगह बदलने की अपेक्षा अपनी वाणी को बदलना चाहिए। वाणी बदलने पर जगह बदलने की जरूरत नहीं पड़ती है। श्रावक के वचन व्यवहार पर प्रकाश डालते हुए डॉ. समणी ने कहा कि साधक को थोड़ा बोलने के साथ साथ आवश्यकता होने पर मीठा बोलना चाहिए। विवेक द्वारा बोलने से अनंत पुण्य का संचय होता है। रक्षा बंधन के उपलक्ष में शनिवार दोपहर 2 बजे से 3 बजे तक आत्म उत्थान हेतु जाप द्वारा साधना का आयोजन किया गया है जिसमें भाई बहन को विशेष रूप से भाग लेना है। आध्यात्मिक रक्षा सूत्र द्वारा भाई और बहन एक दूसरे के लिए संकल्पित होंगे जिससे परिवार में सामंजस्यता का वातावरण बन पायेगा। 



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