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सावन में अगर सामने कोई मुसलमान आ जाए तो ऐसे करें धर्म का बचाव!

सावन का महीना. अपने जबलपुर की एक घटना. एक ज़ोमेटो का ऑर्डर इसलिए कैंसल कर दिया क्योंकि डिलिवरी बॉय मुसलमान था. ऐसा करने वाले अमित शुक्ल ने खुद ही ट्वीट करके इस टुच्चई की जानकारी दी. ये उसी टाइप का सीन है कि ‘आदा पादा कौन पादा’ करने से पहले ही आदमी बोल दे कि ‘मैंने पादा है, मैंने.’

जैसा कि अपने देश में होता है पहले घटना घटती है फिर फटती है. न्यूज़ चैनलों पे. ऐसे ही एक चैनल पर ‘विस्फोटक’ बहस चल रही थी. बहस का शीर्षक था-

क्या धर्म देखकर होनी चाहिए खाने की डिलिवरी?

ऐसी बहसों से ज्यादा कुछ तो नहीं निकलता. कुछ ढंग का निकलता है तो वो है मीम मटेरियल. ऐसे ही एक मीम मटेरियल हमको उस क्लिप में दिखे. इनका नाम है अजय गौतम. अजय ने अपनी आंखों के आगे अपने दो हाथ लगा लिए. किसलिए? ताकि वो देख न सके. क्या देख न सके? एंकर. वो एंकर क्यूं नहीं देखना चाहता था? क्योंकि शो में अगले सेगमेंट का एंकर एक मुस्लिम था. एंड यू नो आजकल मुस्लिम-बैशिंग इज़ काइंड ऑफ ‘कूल’. बाकी अगर हमारे कहे का लाइव डेमो देखना है, या हाथ कंगन को आरसी चाहिए तो ये देखिए वो क्लिप –

आंखों के आगे पट्टी लगा लेने की बात हमने महाभारत में सुनी है. गांधारी के पति धृतराष्ट्र जन्म से अंधे थे. तो गांधारी ने सोचा ‘व्हाई शुड बायज़ हैव आल द फन’. और गांधारी ने अपनी आंखों के आगे पट्टी बांध ली. गांधारी के पति अंधे थे, अजय गौतम जैसों की सावनवादी विचारधारा जन्म से अंधी है. जब गांधारी ने अपनी आंखों से पट्टी हटाई थी तो उन्हें दुर्योधन दिखा था. नेकेड. नंगा. अजय गौतम और अमित शुक्ल जैसों की आंखों से भी जब पट्टी हटेगी, तो इन्हें ऊबर और ज़ोमेटो के बॉयकॉट वाले हैशटैगों के उस पार खुद पे बने मीम दिखेंगे.

गांधारी ने दुर्योधन को आधा नंगा ही देखा था. और ये बात आखिरी गदा-युद्ध में दुर्योधन की की हार का कारण बनी थी. सोर्स – महाभारत, बी.आर. चोपड़ा वाली.

यार. एक बात सही-सही बताएं? ये विस्फोटक बहस कराने वाले भी चुन-चुन के नमूनों को बुलाते हैं. मतलब हो सकता है आपसे एकाध-दो बार गलती हो गई. मगर हर बार! बार-बार! ये ‘ट्रायल ऐंड ऐरर’ के नियम के अपवाद हैं. कितना भी रस्सी घिसो, निशान नहीं बनेगा.

गांधी जी कहते थे – ‘बुरा मत देखो, बुरा मत बोलो, बुरा मत सुनो.’ सावनवादी कहते हैं – ‘मुस्लिम मत देखो, मुस्लिम मत सुनो और सावन में मुस्लिम डिलिवर्ड फूड तो बिलकुल मत खाओ.’ उनको खाने में धर्म दिखता है, रंगों में धर्म दिखता है, भाषा में धर्म दिखता है.

उनको तो ये सब दिखता है लेकिन हमको वो ही लोग क्यों दिखते हैं? चाहे वो राखी सावंत हो या स्वामी ओम हो. हम क्यों देखना चाहते हैं टुच्चहांई में विशारद लोगों को? उनका तो पर्पस सॉल्व हो जाता है. उनकी ज़िंदगी का एक्कई मकसद है – ड्रामा. ये तो भसड़ मचाते ही इसलिए हैं कि उनको अटेंशन मिले. अगर ये जीवन शोले है तो ये लोग पानी की टंकी पे चढ़े वीरू हैं. तो गांव वालों, बात को थोड़ा समझिए और बरतिए.

आपको लग रहा होगा कि देखो ये कैसी ‘आयरनी की अम्मा’ है’. हमको बोल रहे हैं देखो मत. और खुद अपनी वेबसाइट पे खबर ठेल रहे हैं.’ गुरु आयरनी तो है. लेकिन क्या करें? गेंद कीचड़ में है. खेल सही जगह पे खेला जाए, इसके लिए ज़रूरी है कि हम कीचड़ में उतरें और गेंद को वापस मैदान की तरफ उछालें.



Reported By:ADMIN
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