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बजट भारत का, लेकिन सबसे ज़्यादा खुश शायद अमेरिकी कंपनी टेस्ला के मालिक एलन मस्क होंगे

पैदल चल रहा हूं एक गाड़ी चाहिए, अकेला है मिस्टर खिलाड़ी मिस खिलाड़ी चाहिए. जी हां, गाड़ी. विदेश में गाड़ी सिर्फ़ गाड़ी होगी, लेकिन हमारे मुल्क़ में गाड़ी सिर्फ़ गाड़ी नहीं होती. उससे कहीं बढ़कर होती है.

धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के चार पहियों पर चलती है हमारी सनातनी व्यवस्था. और इन चारों तत्वों में एक चीज़ कॉमन है. प्रेम. और हमारे देश में गाड़ी और प्रेम का ज़मीन आसमान का साथ है. बिन गाड़ी सब सून. प्रेम चाहिए गाड़ी लाइए. 1969 में मुहम्मद रफ़ी के गीत ‘चक्के में चक्का, चक्के पे गाड़ी … गाड़ी पे निकली अपनी सवारी’ से लेकर, इधर हाल में आया बोहेमिया का गाना  ‘कुड़ी कैंदी बेबी पैले जगुआर ले लो. फेर जिन्ना मर्ज़ी प्यार ले लो’ तक गाड़ी प्रेम का पेट्रोल बनी रही है. प्रेम की गाड़ी इसी फ़ौलादी चौपाए पर दौड़ती रही है.

साल 1975 में आई ‘दीवार’ फ़िल्म. दुनियावी रास्तों से क़ामयाबी हासिल कर चुका एक नायक अपने ईमानदार पुलिस इन्स्पेक्टर भाई से पूछता है, ‘आज मेरे पास बैंक बैलेंस है, बंगला है, गाड़ी है…क्या है तुम्हारे पास?’, और जवाब आता है ‘मां’. लेकिन रील दुनिया से इतर रीयल दुनिया की मां भी यही चाहती है कि उसका बच्चा क़ामयाब हो. और क़ामयाबी का क्या मतलब है? …गाड़ी बंगला. कुल मिला-जुलाकर समझिए तो गाड़ी हमारे यहां मोहल्ले में इज़्ज़त है, मां का सपना है, कामयाबी की धमक है…लगभग सब कुछ. इस सब कुछ में किसी पिता की सयानी हो चुकी बिटिया भी है, जिसके सपने का राजकुमार घोड़े पर नहीं, चमचमाती बड़ी सी गाड़ी में आएगा. इस सब कुछ में ‘कुछ कर गुज़रने की चाहत’ रखे नौजवान हैं. जो किसी दिन चुपके से अपने घर के सामने एक गाड़ी खड़ी करना चाहते हैं, और मां पापा को उनकी आंखों पर हाथ धरे बाहर लाकर बताना चाहते हैं कि उनका बेटा आख़िरकार क़ामयाब हुआ.

लेकिन इस महादेश में अब वही गाड़ी रुकी हुई है, एक धक्के के लिए बजट का मुंह ताक रही थी. धक्का क्यों चाहिए? क्योंकि देश का ऑटोमोबाइल सेक्टर, यानि गाड़ियों का बाज़ार मंदा है. और इतना मंदा है कि पिछले कुछ महीने से कई कंपनियों ने गाड़ियों के प्रोडक्शन पर ही हैण्ड ब्रेक लगा दिया है.

# क्या धक्का मिला इस बाज़ार को बजट से?

उम्मीदें बहुत ज़्यादा थीं. लेकिन पूरी नहीं हुईं. वित्तमंत्री निर्मला सीतारमण ने बजट में दो घोषणाएं ऑटोमोबाइल सेक्टर के लिए सिर्फ़ दो घोषणाएं की हैं.

पहली –

इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर जीएसटी में 5 पर्सेंट की कमी. अब तक इलेक्ट्रिक कारों पर 12 पर्सेंट की जीएसटी लगती थी. अब लगेगी 5 पर्सेंट. इलेक्ट्रिक गाड़ियां सस्ती होंगी.

दूसरी –

अगर आप इलेक्ट्रिक गाड़ियां ख़रीदते हैं तो, इन्कम टैक्स में डेढ़ लाख रुपए की अतिरिक्त छूट क्लेम कर सकते हैं. मतलब ये कि अभी इनकम टैक्स में 80 सीसी के तहत 1 लाख 20 हजार रुपए की छूट क्लेम की जा सकती है. इलेक्ट्रिक कार खरीदने पर डेढ़ लाख की टैक्स छूट और ज्यादा क्लेम की जा सकेगी.

# क्यों न्यूट्रल खड़ा है बाज़ार

ऑटोमोबाइल सेक्टर को दौड़ना चाहिए था टॉप गियर में. लेकिन लगा हुआ है ब्रेक, धंधा मंदा है. पैसेंजर व्हीकल्स की बिक्री मई महीने में जितनी हुई, वो पिछले 18 साल की सबसे बड़ी गिरावट (20.6%) है. यानी आप ये समझ ही सकते हैं कि लोग कितनी कम गाड़ियां खरीद रहे हैं. प्रोडक्शन पर कंपनियों ने ब्रेक लगाया हुआ है. जब गाड़ियां बिकेंगी ही नहीं, तो रोज़ ख़ूब सारी गाड़ियां बनाकर होगा क्या?

जैसे-जैसे ऑटोमोबाइल सेक्टर में गिरावट आ रही है, वैसे-वैसे इन कंपनियों के शेयर भी तेजी से नीचे की तरफ जा रहे हैं. यानि एक ओर ग्राहक गाड़ियां नहीं खरीद रहे हैं और दूसरी ओर पैसा लगाने वाले ऑटोमोबाइल कंपनियों के शेयरों में अपने पैसे नहीं फंसाना चाहते.

# इंडस्ट्री के इंजन में फंसा कचरा है क्या?

गाड़ी बाज़ार के रास्ते में एक नहीं कई रोड ब्रेकर हैं. आइए एक-एक कर समझते हैं.

पहला ब्रेकर

ख़रीदने की ताक़त यानि पर्चेज़िंग पावर कम हुई – गाड़ियां बिक नहीं रहीं हैं. तो ज़ाहिर सी बात है कि ख़रीदने वाले नहीं हैं. कार वाले तो सब होना चाहते हैं, लेकिन अभी भी बे-कार हैं. पैसा नहीं है. पैसा क्यों नहीं है? क्योंकि रोज़गार उतना नहीं है, जितना होना चाहिए. लोगों की पर्चेज़िंग पावर कम हो चुकी है. फेडरेशन ऑफ ऑटोमोबाइल डीलर्स एसोसिएशन (FADA) का कहना है कि ऑटोमोबाइल सेक्टर ने में जो ऐतिहासिक गिरावट दर्ज की गई है उसे सुधरने में समय लगेगा.

दूसरा ब्रेकर-

एक शब्द होता है तकनीक यानि Technology. गाड़ियों की तकनीक हर देश में थोड़ी-थोड़ी अलग होती हैं. जैसे कितनी सीटों में एयर बैग लगेंगे, इंजन टाइप, स्टीयरिंग साइड वगैरह. दरअसल, ऑटोबाइल सेक्टर जल्द ही दूसरी तकनीक पर शिफ्ट होने वाला है. अप्रैल 2020 से हर ऑटोमोबाइल कंपनी को भारत स्टेज 6 (बीएस-6) नियम के हिसाब से गाड़ियां बनानी होंगी. आपको बता दें कि अभी ये गाड़ियां बीएस-4 नियम को अनुसार बन रही हैं.

बीएस-6 का मतलब क्या है? मतलब है ज़्यादा अच्छी गाड़ियां. ज़्यादा सुरक्षा. कम पेट्रोल डीज़ल की लागत, ज़्यादा मज़बूत इंजन, पहले से ज़्यादा फ़ौलादी कार बॉडी. बीएस-6 के हिसाब से जब गाड़ियां बनेंगी तो यूरोप और अमेरिका के स्टैंडर्ड की होंगी. पहले से बेहतर होंगी. हालांकि बीएस-6 के तहत जो गाड़ियां बनेंगी वो नए सुरक्षा नियमों, जैसे एयर बैग वगैरह की वजह से अभी की तुलना में महंगी भी हो जाएंगी.

तीसरा ब्रेकर-

जीएसटी. ये बहुत बड़ा कारण है जिसकी वजह से गाड़ियां बिक नहीं रही हैं. जीएसटी में टैक्स के अलग-अलग स्लैब बने हैं. और सबसे ज़्यादा टैक्स स्लैब है 28 पर्सेंट. जीएसटी का जब विरोध हुआ तो सरकार ने धीरे-धीरे तक़रीबन सभी प्रोडक्ट से 28 पर्सेंट का टैक्स स्लैब हटा दिया, कम कर दिया. लेकिन ऑटोमोबाइल सेक्टर इकलौता ऐसा सेक्टर है जिस पर अभी भी सबसे ज़्यादा 28 पर्सेंट का जीएसटी लगा हुआ है. अगर आप पांच लाख की गाड़ी ख़रीदने जाएं तो आपको उसकी असल क़ीमत 6 लाख चालीस हज़ार पड़ेगी. एक लाख चालीस हज़ार ज़्यादा. इस वजह से भी गाड़ियों का क़ारोबार थमा हुआ है. उम्मीद थी कि जीएसटी घटेगी. लेकिन नहीं घटी.

# बाबू समझो इशारे

किशोर कुमार का मशहूर गीत है. फ़िल्म का नाम है ‘चलती का नाम गाड़ी’.

बाबू समझो इशारे, हौरन पुकारे पौम पौम पौम

यहां चलती को गाड़ी, कहते हैं सारे पौम पौम पौम

गाड़ी बाज़ार भी हौरन दे रहा था, सरकार को बजट में कुछ रियायतें देने के लिए. जैसे-

कार लोन – गाड़ी हमारे इस महादेश में ज़्यादातर लोग बैंक से उधार लेकर ख़रीदते हैं. कार लोन. ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री चाहती थी कि गाड़ी  ख़रीदने पर लगने वाले टैक्स में कटौती की जाए. इससे ख़रीददारी बढ़ेगी. बाज़ार उठेगा. लेकिन कुछ नहीं हुआ.

जीएसटी – तक़रीबन सभी का मानना है कि 28 पर्सेंट वाले टैक्स स्लैब से गाड़ियों को भी हटाना चाहिए. अगर जीएसटी कम होगी तो निश्चित ही गाड़ियों की बिक्री बढ़ेगी. मार्केट मज़बूत होगा. लेकिन जीएसटी घटा सिर्फ़ इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर.

# फ्यूचर के टोल पर खड़ी है नई तकनीक 

पेट्रोल डीज़ल ख़त्म हो रहा है. गाड़ियां चलाते रहने के लिए नया ईंधन चाहिए. तो दो चीज़ें हैं. बिजली और सौर ऊर्जा. नदियां बह रही हैं, बिजली मिलती रहेगी और सूरज रोज़ उगता है तो सौर ऊर्जा भी मिलती रहेगी. इसलिए भविष्य यही हैं. टेस्ला वाले एलन मस्क सबसे ज़्यादा ख़ुश होंगे क्योंकि वो इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर प्रयोग करते रहे हैं. लीडिंग नाम हैं इस तरह की गाड़ियों के बाज़ार में. इलेक्ट्रिक गाड़ियों पर जीएसटी घटी है. लेकिन सवाल अब भी वही है. बाक़ी इंडस्ट्री का क्या?



Reported By:ADMIN
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