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क्या शताब्दी एक्सप्रेस में चलने के लिए सूट टाई पहनना होगा? ये घटना तो यही बताती है

तारीख़ थी 7 जून, साल था 1893. हमारा मुल्क अंग्रेज़ों का ग़ुलाम था. इसी ग़ुलाम मुल्क का एक नौजवान वक़ील साउथ अफ़्रीका गया. ट्रेन में चढ़ा तो उसके पास फ़र्स्ट क्लास डिब्बे में सफ़र करने का टिकट था. लेकिन बीच रास्ते उस नौजवान वकील को ट्रेन से सामान समेत उतार दिया गया. क्यों?

क्योंकि वो काला था. उसका रंग उस देश पर राज करने वालों से इतर था. अलग था. किसी ग़ुलाम मुल्क का एक शख्स अपने फ़र्स्ट क्लास टिकट से चुनौती दे रहा था. कई लोगों के खोखले अहंकार को. यही वजह थी कि उसे ट्रेन से धक्का दे दिया गया. यही नौजवान वकील आगे चलकर इस महादेश के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी हुए. महज़ एक लंगोट पहने, राम नाम भजते, अंग्रेज़ों की सविनय अवज्ञा करते बापू.

तब साल था 1893. आज है 2019. एक शताब्दी से ज़्यादा बीत चुके. और हम अब रहते हैं स्वतंत्र भारत में. लेकिन दो दिन पहले 4 जुलाई को हुई एक घटना इस आज़ादी पर गहरा सवाल खड़ा करती है.

# लेकिन क्या वाक़ई आज़ाद हैं हम

एक ट्रेन है शताब्दी एक्सप्रेस. जब सफ़र करने जाइए तो सूट बूट में टाई लगाए टीटी सा’ब मिलते हैं. वीआइपी ट्रेनों में से एक है शताब्दी. इसलिए टीटी लोग थोड़ा ज़्यादा अंग्रेजीदां बन जाते हैं. कानपुर से दिल्ली के बीच चलती है. बीच में आता है इटावा. और इटावा में ट्रेन का रुकती है महज़ दो मिनट.

72 साल के बुज़ुर्ग रामअवध दास. इटावा स्टेशन पर गाज़ियाबाद आने के लिए खड़े थे. कन्फर्म टिकट था. C-2 कोच में सीट थी. लेकिन बाबा का पहनावा ट्रेन के टीटी को अजीब लगा. महज़ एक धोती और झीनी सी चादर. साथ में कपड़ों की एक पोटली. और पांव में साधारण चप्पल. टीटी पर आरोप है कि रामअवध दास को सिर्फ़ उनके पहनावे की वजह से ट्रेन में चढ़ने से रोक दिया गया.

इटावा स्टेशन जहां की ये घटना है

इटावा स्टेशन जहां की ये घटना है

# बाबा ने शिकायत दर्ज कराई

रामअवध दास का कहना है कि उन्हें ट्रेन पर चढ़ने नहीं दिया गया. और उसके बाद उन्होंने स्टेशन के पुलिस स्टेशन में शिकायत दर्ज कराई. रामअवध दास इसके बाद अगली गाड़ी से जनरल कोच में सफ़र करके गाज़ियाबाद पहुंचे.

रामअवध दास ने शिकायत में बताया कि उनके लाख कहने पर भी उन्हें ट्रेन में नहीं चढ़ने दिया गया

रामअवध दास ने शिकायत में बताया कि उनके लाख कहने पर भी उन्हें ट्रेन में नहीं चढ़ने दिया गया

इस मामले में जब ‘आज तक’ ने इटावा के स्टेशन मास्टर से बात करने की कोशिश की तो उन्होंने कुछ भी कहने से मना कर दिया.

# अब सवाल क्या है

अब सवाल ये है कि क्या हम वाक़ई आज़ाद हुए हैं? क्या आज भी हम पर अंग्रेज़ों की सोच राज नहीं कर रही?

जिस दिन बापू को तीन गोलियां मारी गईं थीं, उन्होंने अंतिम शब्द ‘हे राम’ कहा था. राम को याद किया. अवध के राम को. देश बस आज़ाद हुआ ही था. 4 जुलाई को ट्रेन पर ना चढ़ पाने वाले वाले राम अवध दास उसी गांधी के देश में हैं. हमें सोचना चाहिए कि हमारी किसी ग़लती की वजह से अवध के राम शर्मसार ना हों, राम को मानने वाले बापू की आत्मा ना रोए.

महज़ एक ट्वीट पर ट्रेनों में बच्चों के लिए दूध पहुंचाने वाली रेलवे को ये भी सोचना चाहिए, कि पूरा भारत ट्विटर इस्तेमाल नहीं करता. भारत आज भी उन्हीं गांवों में बसता है जहां से अनेकों अनेक रामअवध, रामदरश, रामतीरथ, रामबदन और बहुत से राम धोती चप्पल में आपकी शताब्दियों और राजधानियों में बैठने आते हैं. यही असली भारत है.



Reported By:ADMIN
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