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शिवराज सिंह चौहान का ये वीडियो नरेंद्र मोदी के खिलाफ बगावत का ऐलान है?

जंग खाया लोहा और वक़्त खाया सवाल ज्यादा खरतनाक होता है. क्या शिवराज सिंह चौहान नरेंद्र मोदी का विकल्प हो सकते हैं? दिल्ली के सियासी गलियारों में इस सवाल की उम्र आधा दशक की हो चुकी है. विधानसभा चुनाव में हार के बाद राजस्थान, छत्तीसगढ़ और मध्य प्रदेश के भूतपूर्व मुख्यमंत्री दिल्ली तलब कर लिए गए. बीजेपी अलाकमान का यह फैसला साफ़ संकेत दे रहा था कि तीनों राज्यों में क्षत्रप बदलने का समय आ गया है. लेकिन अमित शाह का यह फैसला उनके लिए सिरदर्दी साबित होता नजर आ रहा है.

14 जनवरी को मकर सक्रांति थी. मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष शिवराज सिंह चौहान ने एक वीडियो शुभकामना संदेश ट्विटर पर पोस्ट किया. इसमें वो कहते हैं, “सभी देश और प्रदेशवासियों को मकर संक्रांति की हार्दिक शुभकामनाएं. आज से सूर्य उत्तरायण हो जाएंगे. इस काल को पुण्य, शुभ और पवित्र काल माना जाता है. कहते हैं ये काल भगवान का काल माना जाता है. इसलिए मैं आप सब बहनों और भाइयों को हार्दिक शुभकामनाएं देता हूं.”

वीडियो में शिवराज सिंह जो कह रहे थे वो सब हाशिए पर चला गया. वहज थी हाशिए पर रखी एक तस्वीर. या यूं कहें हाशिए पर लगा दिए एक आदमी की तस्वीर. नाम लालकृष्ण आडवाणी. 2004 से 2013 तक आडवाणी के मायने बीजेपी में व्यक्तिवाचक संज्ञा तक सीमित नहीं थे. यह बीजेपी के भीतर सबसे मजबूत खेमा हुआ करता था. शिवराज सिंह इस खेमे के मजबूत सिपहसालार हुआ करते थे. 2013 के जून में बीजेपी का गोवा अधिवेशन था. इसमें नरेंद्र मोदी को 2014 के लोकसभा चुनाव में प्रचार समिति का अध्यक्ष बना दिया गया था. इसके बाद आडवाणी खेमे के कई लोगों ने पांव पीछे खींचने शुरू कर दिए.

13 सितंबर, 2013. नरेंद्र मोदी आधिकारिक तौर पर बीजेपी के प्रधानमन्त्री पद के उम्मीदवार बनाए गए. इसके 12 दिन बाद 25 सितंबर, 2013 के रोज उनकी भोपाल में रैली हुई. मंच पर नरेंद्र मोदी और शिवराज सिंह चौहान के अलावा राजनाथ सिंह और लालाकृष्ण आडवाणी भी मौजूद थे. स्थानीय बीजेपी कार्यकर्ताओं ने इन चारों का स्वागत गुलदस्ते देकर किया. गुलदस्ता लेकर खड़े नरेंद्र मोदी ने छापामार तरीके से आडवाणी के पैर छू लिए. यह सब इतना तेजी से हुआ कि आडवाणी आशीर्वाद के लिए हाथ उठाने की बजाए भौंहे सिकोड़ते देखे गए. इसी रैली में मध्य प्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने आडवाणी को लोकसभा चुनाव लड़ने के लिए भोपाल आने का न्यौता दे दिया. इससे पहले आडवाणी गुजरात की गांधी नगर सीट से पांच दफा सांसद रह चुके थे. इसे उस समय शिवराज की मोदी विरोधी खेमेबंदी के तौर पर देखा गया.

शिवराज को भोपाल के राजनीतिक विश्लेषक ‘चुप्पा चौहान’ कहते हैं, जो पृथ्वीराज चौहान की तरह अपना निशाना कभी नहीं चूकता. जानकार तो यहां तक कहते हैं कि शिवराज सिंह के मन में किसके बारे में क्या चल रहा है यह उनकी पत्नी साधना सिंघह को भी नहीं पता होता. वो चुपचाप अपनी सियासत करते हैं. मध्य प्रदेश के सीएम रहते उन्होंने दिल्ली दरबार को साधने में अपने इसी कौशल को दिखाया है. 2009 के लोकसभा चुनाव के वक्त सुषमा स्वराज के लिए उन्होंने विदिशा लोकसभा सीट खाली की थी. वो सक्रिय तौर पर सुषमा के प्रचार में लगे रहे. वो इस सीट से पांच बार सांसद रह चुके थे.

इसी तरह 2009 में जब नितिन गडकरी को नागपुर से बीजेपी का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया तो उनका काफी मजाक उड़ाया गया. उन्हें राजनीति में अनाड़ी की संज्ञा दी गई. इस छींटाकशी में बीजेपी के कई नेता शामिल थे. शिवराज सिंह ने इसे दिल्ली दरबार के साथ संधि करने के सबसे सही अवसर की तरह भुनाया. गडकरी नागपुर से आते हैं. संघ का गढ़ होने के बावजूद यहां से लोकसभा चुनाव जीतना आसान न था. गडकरी अपने लिए सुरक्षित सीट की तलाश में थे. शिवराज ने उन्हें इंदौर से चुनाव लड़ने का ऑफर दिया. इंदौर में मराठीभाषी लोगों की अच्छी-खासी तादाद है. उन्होंने अपने एक दांव से आडवाणी खेमे के विरोधी नितिन गडकरी को अपने पक्ष में कर लिया.

2019 की बीजेपी और क्लब 160

नरेंद्र मोदी 2014 में देश के प्रधानमन्त्री बने और अमित शाह बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष. इस तरह पार्टी और सरकार दोनों पर नरेंद्र मोदी की पकड़ स्थापित हो गई. 2014 में नरेंद्र मोदी को प्रधानमन्त्री के दावेदार के तौर पर चुनाव लड़ रहे थे. इधर बीजेपी के कई नेता थे जिन्हें यह भरोसा था कि नरेंद्र मोदी अपने दम पर बहुमत नहीं हासिल कर पाएंगे. और गोधरा का भूत उन्हें गठबंधन के लिए साथी जुटाने नहीं देगा. इन नेताओं का अनुमान था कि मोदी कितना भी दम से लड़ें 160 से 180 के बीच कहीं जाकर अटक जाएंगे. बीजेपी के भीतर नेताओं के इस खेमे को ‘क्लब-160’ कहा गया. नितिन गडकरी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज, शिवराज सिंह, आडवाणी, शिवराज सिंह चौहान, वसुंधरा राजे जैसे कई नेता इस क्लब के सदस्य हुआ करते थे. शिवराज सिंह चौहान नरेंद्र मोदी की तरह लगातार तीन विधानसभा चुनाव जीतने में कामयाब रहे थे. वो नरेंद्र मोदी की तरह पिछड़ी बिरादरी से आते थे. आडवाणी खेमे ने बड़े जोर-शोर से शिवराज सिंह चौहान को नरेंद्र मोदी के बरक्स खड़ा करना शुरू किया. मगर लोकसभा चुनाव के नतीजों ने क्लब 160 को बर्फ लगा दिया.

नितिन गडकरी फिलहाल नरेंद्र मोदी विरोधी खेमे की अगुवाई कर रहे हैं

नितिन गडकरी फिलहाल नरेंद्र मोदी विरोधी खेमे की अगुवाई कर रहे हैं

2014 में जब नरेंद्र मोदी ने दिल्ली की गद्दी संभाली थी, बीजेपी की महज 7 राज्यों में सरकार थी. 2018 दिसंबर से पहले यह संख्या 21 पर पहुंच गई. एक तरह से कहा जाए तो अमित शाह के नेतृव में बीजेपी ने पूरे उत्तर और पूर्वोत्तर भारत में अपना परचम बुलंद करने में कामयाबी हासिल की. क्लब 160 के सारे खिलाड़ी अपना अस्तित्व बचाए रखने की जद्दोजहद में लगे रहे. 2018 में तीन राज्यों में हार के बाद क्लब-160 ने मोदी के विरोध में नए सिरे से बगावत बुननी शुरू की. नितिन गडकरी फिलहाल इसके अगुवा बने हुए हैं.

शिवराज सिंह को दिल्ली बुलाए जाने के पीछे बीजेपी के भीतर से दो मुख्य तर्क दिए गए. पहला कि बीजेपी इन सूबों में नेताओं की नई पौध खड़ी करना चाह रही है. दूसरा अगर बीजेपी 2019 के लोकसभा चुनाव में कमजोर होती है तो यह वसुंधरा और शिवराज की स्थिति को मजबूत करेगा. यह भीतरघात के लिए सबसे सही मौसम होगा. ऐसे में इन नेताओं को दिल्ली बुलाना जरूरी था. लेकिन इस फैसले के अपने खतरे हैं. दिल्ली में पहले से ही मोदी विरोधी खेमे ने आकार लेना शुरू कर दिया है. वसुंधरा राजे और शिवराज की दिल्ली आमद इस गोलबंदी को मजबूत ही करेगी. शिवराज सिंह के मकर सक्रांति का वीडियो बधाई संदेश इस बात की तस्दीक कर रहा है.



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