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क्या मोदी सरकार यह कदम कश्मीरी विस्थापितों का भरोसा जीत पाएगा?

14 सितंबर 1989. पेशे से वकील और भारतीय जनता पार्टी के नेता पंडित टिकालाल को श्रीनगर में उनके घर के बाहर गोलियों से छलनी कर दिया गया. पंडित टिकालाल कश्मीर घाटी में हिन्दुओं के बड़े नेता थे. उनकी हत्या ने घाटी में रह रहे अल्पसंख्यक हिंदू और सिखों को डर और सदमे से भर दिया. यह पहला मौक़ा था जब घाटी में अल्पसंख्यक हिंदू बिरादरी को महसूस हुआ कि अलगाववादियों की तरफ से दी जा रही कश्मीर छोड़ने की धमकी को गंभीरता से ना लेना उनकी गलती थी.

4 जनवरी 1990 के रोज स्थानीय उर्दू अखबार अफताब ने हिजबुल-मुजाहिदीन के हवाले से एक प्रेस विज्ञप्ति छापी. इस विज्ञप्ति में कश्मीरी पंडितों को तुरंत घाटी छोड़ने के आदेश दिए गए थे. देखते ही देखते घाटी में हिंदू बिरादरी गायब हो गई. 1990 में घाटी में हिन्दुओं की आबादी तीन से छह लाख के बीच थी. 2016 के आंकलन के मुताबिक यह सिमटकर 30,000 पर पहुंच गई. 1990 के विस्थापन को तीन दशक का समय बीत चुका है.

काले सूट में बाएं तरफ खड़े पंडित टिकालाल. यह उस दौर की तस्वीर है जब कश्मीर को जमीन का स्वर्ग कहा जाता था.

काले सूट में बाएं तरफ खड़े पंडित टिकालाल. यह उस दौर की तस्वीर है जब कश्मीर को जमीन का स्वर्ग कहा जाता था.

कश्मीरी पंडितों का पुनर्वास जम्मू और कश्मीर में बीजेपी के चुनावी घोषणा पत्र का मुख्य हिस्सा रहा है. पिछले तीन दशक से बीजेपी घाटी में इस मुद्दे पर राजनीति करती आ रही है. नवंबर 2014 में कश्मीर हुए विधानसभा चुनाव में 87 में 25 सीट जीतकर बीजेपी सूबे में दूसरी बड़ी पार्टी बनी थी और पीडीपी के साथ गठबंधन करके सत्ता में आई. इसके बाद उम्मीद जगी कि कश्मीरी पंडितों के घर वापसी का रास्ता खुल पाएगा. लेकिन हुआ इसका उल्टा. बीजेपी के सत्ता में आते ही घाटी का माहौल और ज्यादा बिगड़ गया.

मई 2018 में नरेंद्र मोदी कश्मीर के बांदीपोर में थे. यही वो जगह थी जहां 1990 में कश्मीरी पंडितों के खिलाफ सबसे भयंकर हिंसा के वारदातें हुई थीं. नरेंद्र मोदी यहां 330 मेगावाट के किशनगंगा पावर प्रोजेक्ट का उद्घाटन करने आ हुए थे. देश भर में बैठे कश्मीरी पंडित मोदी के दौरे से काफी में उम्मीदे थीं. बीजेपी पीडीपी के साथ सूबे की सत्ता में थी और प्रधानमन्त्री मोदी ने अपने दौरे में कश्मीरी पंडितों के बारे में चुप्पी साधे रखी.

अब लोकसभा चुनाव से ठीक पहले मोदी सरकार को फिर से कश्मीरी पंडितों की याद आई है. 14 जनवरी को नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल सेक्रेटेरिएट (NSCS)की तरफ से जम्मू-कश्मीर प्रशासन से विस्थापित कश्मीरी पंडितों की अचल संपति का डाटा मांगा है, हालांकि NSCS ने यह बात साफ़ नहीं की है कि उसे इस आंकड़े की जरुरत क्यों आन पड़ी. जम्मू-कश्मीर को लिखे खत में NSSC ने विस्थापित कश्मीरी पंडितों की ऐसी संपत्ति की जानकारी मांगी है जो सरकार के कब्जे में है.

कश्मीर में पिछले एक दशक से अशांति का माहौल है. मोदी सरकार के आने बाद यह अश्न्ति कम होने की बबजाए बढ़ी ही है.

कश्मीर में पिछले एक दशक से अशांति का माहौल है. मोदी सरकार के आने बाद यह अश्न्ति कम होने की बबजाए बढ़ी ही है.

1997 में जम्मू-कश्मीर विधानसभा ने जम्मू-कश्मीर माइग्रेंट इममूवेबल प्रॉपर्टी एक्ट पास किया था. इस एक्ट के तहत उन विस्थापितों को रखा गया था जो 1 नवंबर 1989 के बाद अपना घर छोड़कर चले गए थे. इस एक्ट के तहत कई ऐसे प्रावधान बनाए गए थे जिससे विस्थापितों की अचल संपति की सुरक्षा की जा सके. किसी भी विस्थापित को दबाव के चलते अपनी जमीन-जायदाद बेचने पर मजबूर ना होना पड़े. इसी एक्ट को आधार बनाकर जम्मू-कश्मीर सरकार ने विस्थापितों की जमीन को अवैध कब्जे से छुड़वाकर अपने संरक्षण में ले लिया था.

जम्मू-कश्मीर प्रशासन ने NSSC का खत मिलने की पुष्टि की है. जम्मू-कश्मीर के कमिश्नर सेक्रेटरी (रेवन्यू) शाहिद इनायुतुल्लाह का कहना है कि उन्हें NSSC का खत 24 जनवरी को मिल गया है. विस्थापितों की संपति का डाटा तहसील के स्तर पर उपलब्ध है. इसे एक जगह इकठ्ठा करके जल्द ही NSSC को भेज दिया जाएगा. इस काम में ज्यादा से ज्यादा 15 दिन का समय लगना चाहिए.

2011 में कश्मीर ने नए सिरे से अलगाववादी आंदोलन शुरू हुआ था. इस सरकार के कार्यकाल में कश्मीर की अशांति में किसी भी तरह की गिरावट दर्ज नहीं की गई. हालांकि NSSC ने इस डाटा की जरूरतों को साफ़ नहीं किया है लेकिन इसकी वजह से जम्मू-कश्मीर की सियासत में नए सिरे उबाल आना तय है.



Reported By:Admin
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