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मैं बहुत छोटी थी जब एक इज्जतदार आदमी, मुझे पकड़कर बाथरूम में ले गया था

यह आर्टिकल डेली ओ से लिया गया है जिसे चिंकी सिन्हा ने अंग्रेज़ी में लिखा है.
हिंदी में यहां प्रस्तुत कर रही हैं शिप्रा किरण.


मैं उस 8 साल की बच्ची को भूल नहीं पाती. उसके बलात्कार और हत्या के दुःख से बाहर नहीं निकल पा रही मैं.

बैंगनी कुरते पर पीले फूलों, बड़ी आंखों और मासूम चेहरे वाली वह बच्ची दिन रात जैसे मेरी ओर ताकती रहती है. मुझे अपने बचपन की तस्वीरों में भी वही नज़र आती है. हमारे आसपास चल रही ऐसी तमाम डरावनी घटनाओं के आगे कैसे हम निरीह और असहाय हो जाते हैं. हम शर्मिन्दा होते हैं और बहुत जल्द हम उस शर्मिंदगी से उबर भी जाते हैं. लेकिन फिर भी ये घटनाएं हमारी स्मृतियों में पैवस्त रह जाती हैं.

मेरी उम्र 38 साल है और मुझे धर्म, सत्ता और मर्दों की हैवानियत से डर लगता है. मुझे अपने औरत होने से डर लगता है. मैं बहुत छोटी थी जब सभ्य कहे जाने वाले इस समाज एक  इज्जतदार आदमी मुझे पकड़कर बाथरूम में ले गया था. मुझे आज भी बाथरूम की वह नीली टाइलें याद आती हैं. उन्हें याद कर मैं आज भी कांप उठती हूं. हम उसके घर के बाहर खेला करते थे. वह प्रोफ़ेसर था. उसकी पत्नी मर चुकी थी. मैं छोटी थी लेकिन मुझे सही गलत कि थोड़ी बहुत समझ थी, लग गया था कि कुछ ठीक नहीं है. डर कर मैं वहां से भाग आई थी. मैंने उसके घर के आगे खेलना छोड़ दिया था. लेकिन मैंने यह बात किसी से नहीं बताई. इस बात को न जाने कितने साल बीत चुके लेकिन वे ब्लू टाइलें मुझे अब भी नहीं भूलतीं. नफरत है मुझे उनसे.

ऐसा एक बार और हुआ. इस बार सर्कस के बाहर भीड़ में. एक आदमी अंधेरे में मुझे टटोल रहा था. एक बार और…अंधेरी सीढ़ियों पर भी. मेरे गिरने से सीढ़ियां कहीं-कहीं टूट भी गई थी. मैं शायद अब भी उसी अंधेरे में कहीं गुम हूं. मेरा बचपन धीरे-धीरे कहीं खो सा गया था.

 

rape victim

वो अजीब सा दौर था. तब लड़कियों को चार बजे शाम के बाद घर से बाहर रहने की इजाज़त नहीं थी. वो 1999 का एक दिन था जब पटना में मेरे कॉलेज की सीनियर शिल्पी जैन की अधनंगी लाश एक कार में पड़ी मिली. पहली बार मैंने इतने करीब रेप जैसी कोई घटना देखी थी. मुझे आज भी उसका चेहरा याद आता है. और कुछ नहीं उसे सिर्फ उसके औरत होने की सजा मिली थी. उस समय भी आन्दोलन हुए थे पर अंततः हुआ कुछ नहीं था.

कठुआ गैंगरेप भी धर्म और पितृसत्ता के इसी घिनौने चेहरे का एक नमूना है. इस मामले में न्याय मिलने तक न जाने और कितनी ऐसी घटनाएं हो चुकी होंगी. बलात्कार जैसी घटनाएं क्यों हो रही हैं और इन्हें कैसे रोका जाए. ऐसे कई सवाल हमारे पास हैं पर इनके जवाब हमारे पास नही हैं. रेप का सम्बन्ध सिर्फ स्त्री तक सीमित नहीं है बल्कि जाति और वर्ग के सवाल भी इससे जुड़े हैं.

हम औरतें हर जगह मर्दों की निगाहों से छुपती रहती हैं. एक आदमी मेरा पीछा किया करता था. केस दर्ज़ कराने पर वकीलों ने उल्टा मुझसे ही सवाल किए. मुझसे पूछा गया कि मैंने फेसबुक पर उस व्यक्ति से दोस्ती क्यों की? सुनवाई के दौरान वह आदमी जब भी मुझे कोर्ट में दिखाई देता मैं उसकी नजरों से बचना चाहती. मैं नहीं चाहती थी कि उसकी निगाह मुझ पर पड़े. ये सच है कि मुझे डर लगता है. ये सच है कि उस घटना के बाद मैं बहुत दिनों तक सामान्य जीवन नहीं जी पाई. उस मामले में मैं अब भी कोर्ट की सुनवाई की प्रतीक्षा कर रही हूं.

एक स्त्री होने के नाते अब तो ऐसा लगता है जैसी हमारी देह ही हमारे लिए बोझ बन गई हो. कोई अभिशाप जिसके साथ जीना असंभव सा हो.

मेरी माँ ने मेरे लिए जिस आज़ाद और निडर जीवन का सपना देखा था वह टूट गया है.

मैं अकेली रहती हूं और हर रात यही मनाती हूं कि बलात्कार जैसी कोई दुर्घटना मेरे साथ न हो. ऐसा नहीं है कि मुझमें हिम्मत की कमी है लेकिन यह भी सच है कि भारतीय न्याय व्यवस्था पर मेरा बिल्कुल भरोसा नहीं रहा.

 

candle

इन खतरनाक चुप्पियों से मुझे नफरत है. यह लिखते हुए कम से कम मुझे यह संतोष है कि मैं कम से कम अपने डर के बारे में बात तो कर पा रही हूं.

उस आठ साल की बच्ची ने आखिर ऐसा क्या गुनाह किया था जिसकी उसे सज़ा दी गई. हर बलात्कार की तरह लोग कुछ दिन बाद इसे भी भूल जाएंगे.

हमें तमाम तरह के आंकड़े दिखाए जाते हैं. हमें यह बताया जाता है कि हम कितने सुरक्षित हैं.

आप कहते हैं आपने आतंकवादी मार गिराए. आप कहते हैं हमारी सीमाएं सुरक्षित हैं.

 

rape 1

आप यह बताते हैं कि हमें मुसलमानों और दलितों से, पाकिस्तान और चीन से ख़तरा है. और भी न जाने कितने खतरे गिनाते हैं. जबकि असल में हमें आपसे और आपकी ताकत से खतरा है.

 

जब एक छोटी बच्ची मरती है आप चुप्पी साध लेते हैं. आपकी यह चुप्पी आपको भी हत्यारा साबित करती है. बलात्कारी साबित करती है. किसी ख़ास विचारधार के नाम पर जब आप बलात्कार जैसी नृशंस घटना को सही ठहराते हैं तो असल में आप भी कहीं न कहीं अपराधियों के साथ खड़े होते हैं.

हम एक डरावने दौर से गुजर रहे हैं. अविश्वास और नाउम्मीदी के दौर से भी.



Reported By:Admin
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