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विश्व संवाद के प्रणेता देवर्षि नारद


    भारत के हिन्दू शास्त्रों में देवर्षि नारद को ब्रह्मा के सात मानस पुत्रों में से एक माने जाते हैं और सभवतः इसीलिए वे ब्रह्माण्ड में तीनों लोकों में देव, दानव और मानव सभी के पूज्य और सम्माननीय थे। हालांकि नारद इधर की बात को उधर करने और परस्पर चुगलखोरी करने वाले चतुर-चपल और बातूनी व्यक्ति के रूप में प्रसिद्ध हुए हैं, तथापि यह तो स्पष्ट है कि वे इस सबमें कहीं धर्म का प्रचार और लोक कल्याण के विचार को ही प्रसारित करते थे। परस्पर एक-दूसरे से होने वाले खतरों के प्रति आगाह करने और उनको उनकी गल्तियों के प्रति सावचेत करने तथा सर्वत्र भलाई करने और कार्याें को सुलभ-सरल बनाने के हेतु से सदैव भ्रमणषील रहने वाले सर्वहितेषी देवर्षि नारद मुनि को संचार व्यवस्था के प्रथम आविष्कारक, विष्व संवाद का प्रणेता और आद्य संवादाता कहा जाना सर्वथा उचित ही है।
    पत्रकारिता की तीन प्रमुख भूमिकाएं सर्वमान्य हैं- सूचना देना, षिक्षित करना और मनोरंजन करना। यदि हम बुद्धिमतापूर्ण दृष्टि से देखें तो नारद भी यही तो करते थे। नारद केवल सूचनाएं देने का कार्य ही नहीं करते वरन् सार्थक संवाद का वातावरण निर्मित करते थे। कई लोग भ्रांतिवष उन्हें आपस में बहकाने वाले या कलह कराने वाले के रूप में देखते हैं। किन्तु नारद मुनि के समग्र व्यक्तित्व और कृतित्व को देखने से यह भ्रांति स्वतः ही नष्ट हो जाती है। जिन भावनाओं से लोकमंगल होता हो वे ऐसी भावनाओं को ही उकसाने का कार्य करते थे, कभी भी वे विनाषकारी, द्वेषपूर्ण या जनहानिकारक सूचनाओं का प्रसार नहीं करते थे। सभी को सद्कार्य के लिए प्रोत्साहित करने की ही उनकी नीयत रहती थी। वे सदैव सत्य पर अडिग रहने वाले और सत्य व धर्म की रक्षार्थ तो वे कोई भी साहसिक कार्य तक करने को तत्पर रहते थे। सार्थक पत्रकारिता वहीं है जो निष्पक्ष हो, किसी के दबाव या प्रभाव से विचलित न हो। नारद की कार्यषैली इसका प्रत्यक्ष उदाहरण है।
नाटकों में जो काम विदूषक करता है वही काम नारद भी अनेक अवसरों पर करते। बल्कि वे तो अधिकांषतः अपनी बात को बड़े ही विनोदी और संगीतमय वाणी में अभिव्यक्त करते थे। कभी भी किसी स्वार्थ के लिए उन्होंने कोई संवाद नहीं कहा, सदैव लोककल्याण व धर्माचरण की स्थापना ही उनका ध्येय रहा। तब संचार का कोई और माध्यम उपलब्ध नहीं था इसलिए वे अपनी वीणा साथ में लिए घूम-घूम कर सूचनाओं को संचार किया करते थे। रामावमतार से लेकर कृष्णावतार तक हर युग में उन्होंने लोकहितकारी पत्रकारिता का ही उदाहरण प्रस्तुत किया। वे सदा ही परस्पर संवाद का सेतु जोड़ने का कार्य करते थे। उनके इन्हीं गुणों को देखते हुए हम उन्हें ब्रह्माण्ड के प्रथम आदर्ष पत्रकार कहें तो यह यथेष्ट ही होगा। वर्तमान संचार प्रोद्योगिकी के युग में समाचारों, देष-दुनिया की सभी सूचनाओं और मनोरंजन के साधनों की उपलब्धता के अनेक संचार माध्यम उपलब्ध हैं, फिर भी यदा-कदा पत्रकारिता को लेकर प्रष्न उठते रहते हैं। ऐसे में महर्षि नारद मुनि एक मार्गदर्षक पत्रकार पुरोधा के रूप में हमारे समक्ष हैं। उनके आचरण, व्यवहार और लोकहितकारी दृष्टि को आधार बनाकर पत्रकारिता का आदर्ष प्रस्तुत किया जा सकता है।  
    
उमेश कुमार चौरसिया

 



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