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संयुक्त राष्ट्र ने माना, क्षेत्रीय सुरक्षा को खतरे में डाल सकती है रोहिंग्या संकट

जकार्ता: संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार प्रमुख ने सोमवार (5 फरवरी) को चेतावनी दी कि म्यांमार द्वारा रोहिंग्या मुस्लिम अल्पसंख्यक के खिलाफ ‘नरसंहार एवं नस्ली सफाए’ की संभावित कार्रवाई से धर्म आधारित संघर्ष बढ़ सकता है और इसका प्रसार अब देश की सीमाओं से बाहर भी हो रहा है. मानवाधिकारों के लिये संयुक्त राष्ट्र उच्चायुक्त जै़द राद अल हुसैन ने जकार्ता में एक आख्यान में कहा, ‘म्यांमार को बेहद गंभीर संकट है और क्षेत्र की सुरक्षा इसका संभावित गंभीर परिणाम हो सकता है.’ 

म्यांमार संकट से प्रभावित रखाइन प्रांत में रोहिंग्या मुसलमानों की सामूहिक कब्रों के बारे में पिछले सप्ताह प्रकाशित एक रिपोर्ट की पृष्ठभूमि में उनकी यह टिप्पणी सामने आयी है. रिपोर्ट में सरकारी सुरक्षा बलों पर इन अल्पसंख्यकों के खिलाफ नस्ली सफाया अभियान चलाने के आरोप लगाए गए हैं. पिछले साल अगस्त के बाद से करीब 7,00,000 रोहिंग्या अल्पसंख्यक पलायन कर सीमावर्ती बांग्लादेश चले गये.

बहरहाल, म्यांमार ने सामूहिक कब्र की रिपोर्ट और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोपों से यह कह कर इनकार किया कि उसने रोहिंग्या विद्रोहियों के विद्रोह के जवाब में मुहिम शुरू की थी. म्यांमार ने संघर्ष क्षेत्र तक संवाददाताओं एवं संयुक्त राष्ट्र जांचकर्ताओं की व्यक्तिगत पहुंच एवं नरसंहार का दावा करने वाले शरणार्थियों की जांच पर रोक लगा दी है. संयुक्त राष्ट्र प्रमुख इंडोनेशिया की तीन दिवसीय यात्रा पर हैं और इस दौरान वह इंडोनेशिया के राष्ट्रपति जोको विदोदो सहित शीर्ष सरकारी अधिकारियों एवं मानवाधिकार समूहों से मुलाकात करने वाले हैं. दुनिया की सबसे विशाल मुस्लिम बहुल आबादी वाले देश इंडोनेशिया में एलजीबीटी समुदाय पर मुहिम सहित कई मुद्दों पर संयुक्त राष्ट्र मानवाधिकार प्रमुख के चर्चा करने की संभावना है.

म्यांमार में हुई हत्याएं नरसंहार की बानगी : संयुक्त राष्ट्र अधिकारी
म्यांमार मुद्दे पर संयुक्त राष्ट्र की विशेष प्रतिवेदक ने बीते 1 फरवरी को इन आरोपों को फिर दोहराया था कि 'म्यांमार की सेना द्वारा रोहिंग्या मुसलमानों की हत्या नरसंहार की बानगी है.' समाचार एंजेसी एफे के मुताबिक, सियोल में एक प्रेस कांफ्रेंस के दौरान यांगी ली ने इस संकट पर चर्चा करने के लिए बांग्लादेश और क्षेत्र के अन्य हिस्सों में शरणार्थी शिविरों का दौरा करने के अनुभव को बताया. पिछले साल 25 अगस्त को विद्रोहियों द्वारा सरकारी चौकियों पर हमला किए जाने के जवाब में म्यांमार की सेना द्वारा शुरू किए गए आक्रामक अभियान के चलते रखाइन प्रांत से कम से कम 688,000 रोहिंग्या मुसलमान पड़ोसी देश बांग्लादेश पलायन कर चुके हैं. ली ने कहा, "म्यांमार की कार्रवाई मानवता के खिलाफ अपराध जैसी थी." उन्होंने कहा, "ये नरसंहार की बानगी का हिस्सा हैं."

दो वर्ष के अन्दर सभी रोहिंग्याओं की वतन वापसी पर समझौता
संयुक्त राष्ट्र के अनुसार, 25 अगस्त के बाद से लगभग 6,55,500 रोहिंग्या शरणार्थी बांग्लादेश में प्रवेश कर चुके हैं, जबकि 5,00,000 रोहिंग्या वहां पहले से ही रह रहे हैं. बांग्लादेश में हाल में हुई हिंसा से पहले प्रवासी विभाग ने 30,000 रोहिंग्याओं को शरणार्थी के तौर पर मान्यता दी थी. म्यांमार और बांग्लादेश सरकार में रोहिंग्याओं के देश प्रत्यावर्तन पर एक समझौता हुआ है. इसके तहत म्यांमार इस समझौते की शुरुआत के दिन से दो वर्ष के अन्दर सभी रोहिंग्याओं का बांग्लादेश से प्रत्यावर्तन हो जाएगा.

पिछले साल अगस्त में हिंसा
म्यांमार में रोहिंग्या मुससमानों के गढ़ रखाइन प्रांत में रोहिंग्या विद्रोहियों द्वारा सैन्य चौकियों पर हमला करने के बाद सुरक्षा बलों ने अगस्त 2017 के अन्तिम सप्ताह में जबाबी कार्रवाई के तहत रोहिंग्या मुसलमानों के खिलाफ अभियान छेड़ दिया था. इसके बाद रोहिंग्या मुसलमानों ने म्यांमार से पलायन शुरू कर दिया. रखाइन प्रांत में लगभग 10 लाख से ज्यादा रोहिंग्या मुसलमान रह रहे थे, जिन्हें म्यांमार सरकार ने मान्यता नहीं दी थी. संयुक्त राष्ट्र और अन्य मानवाधिकार संगठन बोल चुके हैं कि म्यांमार में मानवाधिकारों के हनन के स्पष्ट सबूत मिले हैं. संयुक्त राष्ट्र में मानवाधिकार उच्चायुक्त ने इस सैन्य अभियान को जातीय संहार करार देते हुए इसे नरसंहार का संकेत बताया था.



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