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INDvsSA: टीम इंडिया अगर करती रही ये 5 गलतियां तो सेंचुरियन की डगर होगी मुश्किल

नई दिल्ली: दक्षिण अफ्रीका के दौरे पर जाने से पहले टीम इंडिया ने पूरी तैयारी की थी. कहा जा रहा था कि विराट केहली के नेतृत्व में भारत पहली बार वहां टेस्ट सीरीज जीत सकता है, लेकिन विदेशी पिचें पर तेज गेंदबाजें के न खेल पाने की कमजेरी एक बार फिर सामने आ गई. उनकी बल्लेबाजी ताश के पत्तें की तरह बिखर गई. टीम इंडिया की और भी कई कमजेरियां इस दौरान उजागर हुईं. वर्नोन फिलैंडर की अगुवाई वाले आक्रमण के सामने चोटी के बल्लेबाजों के दूसरी पारी में भी शर्मनाक प्रदर्शन के कारण भारत को दक्षिण अफ्रीका के हाथों पहले टेस्ट क्रिकेट मैच में चौथे दिन 72 रन से हार का सामना करना पड़ा. 

भारतीय गेंदबाजों ने टीम के लिए जीत का मंच सजाया था, लेकिन बल्लेबाज नहीं चले. भारत के सामने 208 रन का लक्ष्य था लेकिन उसकी पूरी टीम 42.4 ओवर में 135 रन पर ढेर हो गए. फिलैंडर ने अपने करियर का सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करते हुए 46 रन देकर छह विकेट लिए. भारत की तरफ से आठवें नंबर के बल्लेबाज रविचंद्रन अश्विन ने सर्वाधिक 37 रन बनाए. बल्लेबाजों की नाकामी से भारतीय गेंदबाजों का शानदार प्रदर्शन भी बेकार चला गया. 

सेंचुरियरन में होने वाले दूसरे टेस्ट से पहले आइए टीम इंडिया की इन कमियों पर नजर डालते हैं: 

स्लिप पर कैच न पकड़ पाने की कमजोरी 
स्लिप कैचिंग न पकड़ पाना भारतीय टीम में एक 'प्लेग' की तरह है. खासतौर से जब मैच रेड बॉल से हो रहा हो. 2017 में टीम इंडिया ने 116 में से, कम से 33 कैच स्लिप पर छोड़े. भारतीय टीम लगातार स्लिप के खिलाड़ियों के बदलती रहती है. एक समय था जब राहुल द्रविड़ स्लिप पर हवा में उछलती हुई कैचों के पकड़ लिया करते थे, लेकिन अब टीम में स्लिप विशेषज्ञ फील्डर कोई दिखाई नहीं देता. विदेशी माहौल में भारतीय बल्लेबाजों के लिए ट्रिकी ट्रैक पर खेलना मुश्किल है, लेकिन वे फील्डिंग करते समय यदि स्लिप के कैच पकड़ सकेंगे तो शायद स्थितियां कुछ बेहतर हो सकती हैं. पहले टेस्ट की पहली पारी में शिखर धवन ने केशव महाराज का तीसरी स्लिप में कैच छोड़ा. केशव ने टीम के लिए महत्वपूर्ण रन बनाए. ये बात टीम के लगातार परेशान करती है कि वे रेड बॉल से स्लिप में इतनी कैच क्यों छोड़ देते हैं.

सीमर्स दबाव नहीं झेल पाते
विदेशी पिचों पर भारतीय सीमर्स की यह दिक्कत रही है कि वे बल्लेबाजों पर लगातार दबाव नहीं बना पाते. यह कमजोरी शुरुआती विकेटें लेने के बाद भी दिखाई पड़ती है. दक्षिण अफ्रीका के दूसरी पारी में 130 रनों पर ढेर करने के बावजूद भारतीय सीमर्स के बारे में यह बात सच है कि दबाव नहीं झेल पाते. मैच के किसी न किसी मोड़ पर भारतीय सीमर्स सब गड़बड़ कर देते हैं. पहली पारी में 12 रनों पर 3 महत्वपूर्ण विकेट लेने के बावजूद सीमर्स ने दक्षिण अफ्रीका को 286 रन बनाने दिए. फॉफ डुप्लेसिस और एबी डीविलियर्स के सीमर्स ने लगातार लूज गेंदें डालीं. लंबे समय बाद टेस्ट में वापसी कर रहे डीविलियर्स इन गेदों को आराम से सीमा पार पहुंचा सके और जब डिविलियर्स को इतना मौका मिल जाए तो उन्हें रोकना मुश्किल हे जाता है. टीम की यही कमजोरी भी केपटाउन टेस्ट में साफ नजर आई.

India vs South Africa

ओपनर्स का अच्छी शुरुआत न दे पाना
भारतीय बल्लेबाजी इस तरह की है, जिसमें हर क्रम पर रन बनाने वाले बल्लेबाज मौजूद हैं, लेकिन शीर्ष क्रम के असफल हो जाने का असर पूरी टीम पर पड़ता है. पहली पारी में हार्दिक पांड्या ने 93 रन और दूसरी में 6 रन बनाए, लेकिन उनके अलावा कोई भी बल्लेबाज 40 का स्केर भी पार नहीं कर पाया. यह बात दिखाती है कि भारतीय टीम किस तरह अच्छी शुरुआत पर निर्भर है. पहली पारी में धवन, पुजारा और बाद में रोहित और अश्विन दोहरे अंकों के स्कोर तक पहुंचे, लेकिन ये दोनों भी नाजुक मोड़ पर आउट होकर पवेलियन लौट गए. किसी भी बल्लेबाज ने पारी के संभालने की कोशिश नहीं की. दूसरी पारी में भारत को ट्रिकी रनों का पीछा करना था, लेकिन चार शीर्ष बल्लेबाज दोहरे अंक तक पहुंचने के बावजूद आउट हो गए. विराट केहली ने मैच के बाद कहा भी कि हमें ऐसा बल्लेबाज चाहिए था जो 75-80 रन बना सके. विराट मैच के बाद बल्लेबाजों के प्रदर्शन से काफी नाखुश नजर आए थे. 

ऑफ स्टंप के बाहर जाती गेंदों से छेड़छाड़ 
ऑफ स्टंप से बाहर जाती गेंदों को छेड़ना पुरानी पंरपरा है और दक्षिण अफ्रीका के तेज गेंदबाजों ने भारतीय बल्लेबाजों के दिमाग को  पढ़कर फुल प्रूफ प्लान बनाया. वे लगातार ऑफ स्टंप के बाहर गेंदें फेंकते रहे. भारतीय बल्लेबाज लगातार उन पर आउट होते रहे. शिकार बने पहली पारी में रोहित और दूसरी में विराट. कोहली बहुत अच्छा खेल रहे थे लेकिन वार्नन फिलैंडर ने उनका विकेट लेकर टीम इंडिया की रही सही उम्मीदों पर पानी फेर दिया. उनके ओवर की पहली तीन गेंदें ऑफ स्टंप के बाहर थीं. कोहली ने उन्हें छोड़ दिया, लेकिन चौथी गेंद ऑफ स्टंप पर पिच हुई और अंदर आ गई और वह एलबीडब्ल्यू आउट हो गए. ऋद्धिमान साहा को पहली पारी में डेल स्टेन ने एलबीडब्ल्यू आउट किया और दूसरी पारी में रबाडा ने उन्हें स्टंप्स के सामने पकड़ लिया. वह एलबीडब्ल्यू हुए. विदेशी माहौल में स्टंप्स की क्लियर लोकेशन पता होना बहुत जरूरी है. ताकि गेंदों को ठीक ढंग से छोड़ जा सके, लेकिन भारतीय बल्लेबाजों को इसके बारे में कुछ पता नहीं था.

India vs South Africa, Team India

सहवाग ने भी दी ऑफ स्टंप के बाहर जाती गेंदों को ना छेड़ने की सलाह
वीरेंद्र सहवाग ने एक न्यूज चैनल में कहा, ‘‘बल्लेबाजों को मेरी यही सलाह है कि वे ऑफ स्टंप से बाहर की गेंदों से छेड़खानी नहीं करें. जितना संभव हो सीधे बल्ले से खेले. आपके शॉट स्ट्रेट ड्राइव या फ्लिक होने चाहिए. किसी की शॉर्ट पिच गेंद पर चोट सहने के लिए भी तैयार रहें. शॉर्ट पिच गेंदों को रोकने के बजाय उन्हें अपने शरीर पर झेलें.’’ सहवाग ने कहा, ‘‘दक्षिण अफ्रीका में गेंद उछाल लेती है जिसका मतलब कि किसी बल्लेबाज के बोल्ड होने की संभावना कम है. इसलिए बल्लेबाजों को सकारात्मक सोच के साथ खेलना होगा और कम से कम तीन रन प्रति ओवर की दर से रन बनाने होंगे.’’

मध्यक्रम को नहीं बचा पाया शीर्ष क्रम
मुरली विजय नई गेंदों को बहुत खूबसूरती से खेलते हैं. उनकी बल्लेबाजी तकनीक पर कभी सवाल नहीं उठते. विदेशी पिचों के लिए मुरली विजय एकमद मुफीद बल्लेबाज हैं, लेकिन दिक्कत यह है कि पहले टेस्ट में असली मुरली विजय दिखाई नहीं दिए. दोनों पारियों में मुरली असफल रहे. दूसरी तरफ शिखर धवन बराबर इस असमंजस में दिखाई पड़े कि गेंद बाहर जा रही है या अंदर आ रही है. उनके ड्राइव इनर सर्कल में खड़े खिलाड़ियों के भी पार नहीं पहुंच पा रहे थे. ऑफ स्टंप के बाहर जाती गेंदों को वे हमेशा संदेह से देख रहे थे. पुजारा की असफलता की भी यही कहानी है. जिस तरह भारत का शीर्ष क्रम आउट हुआ उससे मध्यक्रम पर दबाव बढ़ गया. ओपनरों का यह दायित्व होता है कि वे मध्यक्रम के बल्लेबाजों के लिए गेंद को पुराना करें. टीम इंडिया के ओपनर इस मकसद में असफल रहे और इसी वजह से भारतीय बल्लेबाजी केपटाउन में फेल हुई. 



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